हि

अध्याय 3 · 17 / 43

3.17

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥

यः—जो; तु—किन्तु; आत्म-रतिः—आनन्द लेता है; एव—निश्चय ही; स्यात्—बना रहता है; आत्म-तृप्तः—आत्मप्रकाशित; च—और; मानवः—मनुष्य; आत्मनि—अपने आप में; एव—केवल; च—और; सन्तुष्टः—पूर्णतः तृप्त; तस्य—उसका; कार्यम्—कर्तव्य; न—नहीं; विद्यते—विद्यमान है।

किन्तु जो मनुष्य आत्मा में आनन्द लेता है, जो आत्मा में प्रकाशित है, जो केवल आत्मा में ही हर्षित एवं संतुष्ट है, और पूर्णतः तृप्त है — उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

जो व्यक्ति पूर्णतः कृष्णभावनाभावित है और कृष्णभावनामृत में किए अपने कर्मों से पूर्णतः संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य सम्पादन योग्य नहीं रहता। कृष्णभावनाभावित होने के कारण उसके भीतर का समस्त पाप तत्काल धुल जाता है, जो अनेकानेक सहस्र यज्ञ-सम्पादनों का फल है। चेतना के इस प्रकार शुद्ध हो जाने से मनुष्य परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में अपनी नित्य स्थिति के प्रति पूर्णतः आश्वस्त हो जाता है। इस प्रकार भगवान् की कृपा से उसका कर्तव्य आत्मप्रकाशित हो जाता है, और इसलिए वैदिक विधानों के प्रति उसका कोई दायित्व शेष नहीं रहता। ऐसा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भौतिक कर्मों में अधिक रुचि नहीं रखता और मदिरा, स्त्री तथा इसी प्रकार के मोहों जैसी भौतिक व्यवस्थाओं में आनन्द नहीं लेता।