हि

अध्याय 3 · 18 / 43

3.18

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥

न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; तस्य—उसका; कृतेन—कर्तव्य-सम्पादन से; अर्थः—प्रयोजन; न—न ही; अकृतेन—कर्तव्य न करने से; इह—इस संसार में; कश्चन—कुछ भी; न—कभी नहीं; च—और; अस्य—उसका; सर्व-भूतेषु—समस्त प्राणियों में; कश्चित्—कोई; अर्थ—प्रयोजन; व्यप-आश्रयः—शरण लेना।

आत्म-साक्षात्कारी मनुष्य को अपने विहित कर्तव्यों के सम्पादन में कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं करना होता, और न ही ऐसा कर्म न करने का उसके पास कोई कारण होता है। न ही उसे किसी अन्य प्राणी पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता होती है।

आत्म-साक्षात्कारी मनुष्य कृष्णभावनामृत के कर्मों को छोड़कर किसी भी विहित कर्तव्य को सम्पन्न करने के लिए बाध्य नहीं रहता। कृष्णभावनामृत निष्क्रियता भी नहीं है, जैसा कि आगे के श्लोकों में समझाया जाएगा। कृष्णभावनाभावित मनुष्य किसी व्यक्ति की — चाहे वह मनुष्य हो या देवता — शरण नहीं लेता। कृष्णभावनामृत में वह जो कुछ भी करता है, वह उसके दायित्व के निर्वाह हेतु पर्याप्त है।