अध्याय 3 · 19 / 43
3.19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरूषः ॥ १९ ॥
तस्मात्—इसलिए; असक्तः—आसक्ति रहित; सततम्—निरन्तर; कार्यम्—कर्तव्य रूप में; कर्म—कर्म; समाचर—सम्पन्न करो; असक्तः—अनासक्ति; हि—निश्चय ही; आचरन्—करते हुए; कर्म—कर्म; परम्—परमेश्वर; आप्नोति—प्राप्त करता है; पूरुषः—मनुष्य।
अतएव कर्मों के फलों के प्रति आसक्त हुए बिना मनुष्य को कर्तव्य समझकर कर्म करना चाहिए; क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करते हुए वह परमेश्वर को प्राप्त करता है।
भक्तों के लिए परमेश्वर भगवान् का स्वरूप हैं, और निर्विशेषवादियों के लिए मुक्ति। अतः जो व्यक्ति समुचित मार्गदर्शन में तथा कर्मफल के प्रति आसक्ति बिना श्रीकृष्ण के लिए अथवा कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, वह निश्चय ही जीवन के परम लक्ष्य की ओर प्रगति कर रहा है। अर्जुन को बताया गया कि उसे श्रीकृष्ण के हित हेतु कुरुक्षेत्र के संग्राम में युद्ध करना चाहिए, क्योंकि श्रीकृष्ण चाहते थे कि वह युद्ध करे। भला मनुष्य अथवा अहिंसक मनुष्य होना एक व्यक्तिगत आसक्ति है, किन्तु परमेश्वर की ओर से कर्म करना फल के प्रति आसक्ति बिना कर्म करना है। यही उच्चतम कोटि का पूर्ण कर्म है, जिसकी अनुशंसा साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण करते हैं। विहित यज्ञों जैसे वैदिक कर्मकाण्ड इन्द्रियतृप्ति के क्षेत्र में किए गए पापकर्मों की शुद्धि हेतु सम्पन्न किए जाते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में कर्म शुभ या अशुभ कर्म की प्रतिक्रियाओं से दिव्य है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की फल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती, अपितु वह केवल श्रीकृष्ण की ओर से कर्म करता है। वह सब प्रकार के कर्मों में संलग्न रहता है, फिर भी पूर्णतः अनासक्त रहता है।