हि

अध्याय 3 · 21 / 43

3.21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥

यत्—जो; यत्—और जो भी; आचरति—आचरण करता है; श्रेष्ठः—श्रेष्ठ पुरुष; तत्—वह; तत्—और वही; एव—निश्चय ही; इतरः—सामान्य; जनः—व्यक्ति; सः—वह; यत्—जो भी; प्रमाणम्—प्रमाण; कुरुते—प्रस्तुत करता है; लोकः—समस्त संसार; तत्—उसका; अनुवर्तते—अनुसरण करता है।

महापुरुष जो भी कर्म करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं। और वह अपने आदर्श कर्मों द्वारा जो भी मानदण्ड स्थापित करता है, समस्त संसार उसी का अनुगमन करता है।

सामान्य जनता को सदैव ऐसे नेता की आवश्यकता रहती है जो व्यावहारिक आचरण द्वारा जनसमुदाय को शिक्षा दे सके। यदि नेता स्वयं धूम्रपान करता हो, तो वह जनता को धूम्रपान त्यागने की शिक्षा नहीं दे सकता। भगवान् चैतन्य ने कहा कि शिक्षक को शिक्षा देना आरम्भ करने से पूर्व ही समुचित आचरण करना चाहिए। जो इस प्रकार शिक्षा देता है, उसे आचार्य अर्थात् आदर्श शिक्षक कहा जाता है। अतः शिक्षक को सामान्य मनुष्य तक पहुँचने हेतु शास्त्र के सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए। शिक्षक प्रकट शास्त्रों के सिद्धान्तों के विरुद्ध नियम नहीं गढ़ सकता। मनु-संहिता तथा इसी प्रकार के अन्य प्रकट शास्त्र मानव समाज द्वारा अनुसरण किए जाने योग्य मानक ग्रन्थ माने जाते हैं। इस प्रकार नेता की शिक्षा उन मानक नियमों के सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए जैसा महान् शिक्षक उनका आचरण करते हैं। श्रीमद्भागवत भी इसकी पुष्टि करता है कि मनुष्य को महान् भक्तों के पदचिह्नों पर चलना चाहिए, और यही आध्यात्मिक साक्षात्कार के पथ पर प्रगति का मार्ग है। राजा अथवा राज्य का शासन-प्रमुख, पिता तथा विद्यालय का शिक्षक — ये सभी सामान्य निरीह जनता के स्वाभाविक नेता माने जाते हैं। ऐसे समस्त स्वाभाविक नेताओं का अपने आश्रितों के प्रति महान् उत्तरदायित्व होता है; इसलिए उन्हें नैतिक एवं आध्यात्मिक नियमों के मानक ग्रन्थों से परिचित होना चाहिए।