हि

अध्याय 3 · 22 / 43

3.22

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥

न—कोई नहीं; मे—मेरा; पार्थ—हे पृथापुत्र; अस्ति—है; कर्तव्यम्—कोई विहित कर्तव्य; त्रिषु—तीनों; लोकेषु—लोकों में; किञ्चन—कुछ भी; न—नहीं; अनवाप्तम्—अप्राप्त; अवाप्तव्यम्—प्राप्त किया जाने वाला; वर्ते—संलग्न; एव—निश्चय ही; च—भी; कर्मणि—अपने विहित कर्तव्य में।

हे पृथापुत्र, तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्म विहित नहीं है। न मुझे किसी वस्तु की चाह है, और न ही मुझे कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता है — फिर भी मैं कर्म में संलग्न रहता हूँ।

वैदिक साहित्य में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

tam īśvarāṇāṁ paramaṁ maheśvaraṁ

taṁ devatānāṁ paramaṁ ca daivatam

patiṁ patīnāṁ paramaṁ parastād

vidāma devaṁ bhuvaneśam īḍyam

na tasya kāryaṁ karaṇaṁ ca vidyate

na tat-samaś cābhyadhikaś ca dṛśyate

parāsya śaktir vividhaiva śrūyate

svā-bhāvikī jñāna-bala-kriyā ca.

“परमेश्वर समस्त नियन्ताओं के नियन्ता हैं, और वे समस्त विविध लोक-नायकों में सबसे महान् हैं। प्रत्येक उनके अधीन है। समस्त प्राणियों को विशेष शक्ति केवल परमेश्वर द्वारा ही प्रदत्त है; वे स्वयं परम नहीं हैं। वे समस्त देवताओं द्वारा भी आराध्य हैं और समस्त निर्देशकों के परम निर्देशक हैं। अतएव वे सब प्रकार के भौतिक नायकों एवं नियन्ताओं से दिव्य हैं और सभी के द्वारा आराध्य हैं। उनसे महान् कोई नहीं है, और वे समस्त कारणों के परम कारण हैं।

“उनके पास सामान्य प्राणी जैसा शारीरिक रूप नहीं है। उनके शरीर तथा उनकी आत्मा में कोई भेद नहीं है। वे परम-स्वरूप हैं। उनकी समस्त इन्द्रियाँ दिव्य हैं। उनकी कोई भी इन्द्रिय किसी अन्य इन्द्रिय का कार्य कर सकती है। अतएव उनसे महान् या उनके समान कोई नहीं है। उनकी शक्तियाँ अनेकविध हैं, और इस प्रकार उनके कर्म स्वाभाविक क्रम के रूप में स्वतः सम्पन्न हो जाते हैं।” (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.7-8)

चूँकि भगवान् में सब कुछ पूर्ण ऐश्वर्य के साथ विद्यमान है और पूर्ण सत्य रूप में स्थित है, अतः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए कोई कर्तव्य सम्पादन योग्य नहीं है। जिसे कर्म का फल प्राप्त करना होता है, उसका कोई निर्दिष्ट कर्तव्य होता है, किन्तु जिसे तीनों लोकों में कुछ भी प्राप्त नहीं करना है, उसका निश्चय ही कोई कर्तव्य नहीं होता। फिर भी भगवान् श्रीकृष्ण क्षत्रियों के नायक के रूप में कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में संलग्न हैं, क्योंकि क्षत्रिय दुःखियों की रक्षा करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। यद्यपि वे प्रकट शास्त्रों के समस्त विधानों से ऊपर हैं, तथापि वे ऐसा कुछ नहीं करते जो प्रकट शास्त्रों का उल्लंघन करे।