अध्याय 3 · 23 / 43
3.23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥
यदि—यदि; हि—निश्चय ही; अहम्—मैं; न—नहीं; वर्तेयम्—इस प्रकार संलग्न होऊँ; जातु—कभी; कर्मणि—विहित कर्तव्यों के सम्पादन में; अतन्द्रितः—अत्यन्त सावधानी से; मम—मेरे; वर्त्म—मार्ग का; अनुवर्तन्ते—अनुसरण करेंगे; मनुष्याः—समस्त मनुष्य; पार्थ—हे पृथापुत्र; सर्वशः—सब प्रकार से।
क्योंकि हे पार्थ, यदि मैं कर्म में संलग्न न होऊँ, तो निश्चय ही समस्त मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे।
आध्यात्मिक जीवन में प्रगति हेतु सामाजिक शान्ति का सन्तुलन बनाए रखने के लिए प्रत्येक सभ्य मनुष्य के निमित्त पारम्परिक पारिवारिक प्रथाएँ निर्धारित हैं। यद्यपि ऐसे नियम एवं विधान बद्ध आत्माओं के लिए हैं, भगवान् श्रीकृष्ण के लिए नहीं, तथापि चूँकि वे धर्म के सिद्धान्तों की स्थापना हेतु अवतरित हुए, इसलिए उन्होंने विहित नियमों का पालन किया। अन्यथा सामान्य मनुष्य उनके पदचिह्नों पर चलते, क्योंकि वे परम अधिकारी हैं। श्रीमद्भागवत से ज्ञात होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण घर के भीतर तथा घर के बाहर समस्त धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते थे, जैसा एक गृहस्थ से अपेक्षित होता है।