हि

अध्याय 3 · 24 / 43

3.24

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥

उत्सीदेयुः—विनष्ट हो जाएँ; इमे—ये समस्त; लोकाः—लोक; न—नहीं; कुर्याम्—करूँ; कर्म—विहित कर्तव्य; चेत्—यदि; अहम्—मैं; संकरस्य—अवांछित जनसंख्या का; च—और; कर्ता—जनक; स्याम्—होऊँगा; उपहन्याम्—नष्ट कर दूँगा; इमाः—ये समस्त; प्रजाः—प्राणी।

यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ, तो ये समस्त लोक विनष्ट हो जाएँगे। मैं अवांछित जनसंख्या उत्पन्न करने का कारण भी बनूँगा, और इस प्रकार समस्त चेतन प्राणियों की शान्ति का विनाश कर दूँगा।

वर्ण-संकर वह अवांछित जनसंख्या है जो सामान्य समाज की शान्ति को भंग करती है। इस सामाजिक विक्षोभ को रोकने हेतु ऐसे विहित नियम एवं विधान निर्धारित हैं, जिनके द्वारा जनसंख्या स्वतः शान्त एवं जीवन में आध्यात्मिक प्रगति के लिए संगठित हो सकती है। जब भगवान् श्रीकृष्ण अवतरित होते हैं, तो स्वभावतः वे ऐसे महत्त्वपूर्ण कर्मों की प्रतिष्ठा एवं आवश्यकता बनाए रखने हेतु ऐसे नियमों एवं विधानों का व्यवहार करते हैं। भगवान् समस्त प्राणियों के पिता हैं, और यदि प्राणी पथभ्रष्ट हो जाएँ, तो परोक्ष रूप से उत्तरदायित्व भगवान् पर ही जाता है। अतएव जब-जब नियामक सिद्धान्तों की सामान्य अवहेलना होती है, तब-तब स्वयं भगवान् अवतरित होकर समाज को सुधारते हैं। तथापि हमें सावधानीपूर्वक यह ध्यान रखना चाहिए कि यद्यपि हमें भगवान् के पदचिह्नों पर चलना है, फिर भी हमें यह स्मरण रखना है कि हम उनका अनुकरण नहीं कर सकते। अनुसरण एवं अनुकरण एक ही स्तर पर नहीं हैं। हम गोवर्धन पर्वत उठाकर भगवान् का अनुकरण नहीं कर सकते, जैसा भगवान् ने अपने बाल्यकाल में किया था। किसी भी मनुष्य के लिए यह असम्भव है। हमें उनके निर्देशों का पालन करना है, किन्तु हम किसी भी समय उनका अनुकरण नहीं कर सकते। श्रीमद्भागवत पुष्टि करता है:

naitat samācarej jātu manasāpi hy anīśvaraḥ

vinaśyaty ācaran mauḍhyād yathā ‘rudro ‘bdhijaṁ viṣam

īśvarāṇāṁ vacaḥ satyaṁ tathaivācaritaṁ kvacit

teṣāṁ yat sva-vaco yuktaṁ buddhimāṁs tat samācaret

“मनुष्य को केवल भगवान् तथा उनके सशक्त सेवकों के निर्देशों का पालन करना चाहिए। उनके निर्देश हमारे लिए सर्वथा हितकर हैं, और कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें निर्देशानुसार सम्पन्न करेगा। तथापि मनुष्य को उनके कर्मों का अनुकरण करने के प्रयत्न से सावधान रहना चाहिए। मनुष्य को भगवान् शिव का अनुकरण करते हुए विष का समुद्र पीने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।” (भा. 10.33.30)

हमें सदा ईश्वरों अर्थात् उनकी स्थिति को श्रेष्ठ मानना चाहिए, जो वस्तुतः सूर्य एवं चन्द्रमा की गति को नियन्त्रित कर सकते हैं। ऐसी शक्ति के बिना मनुष्य ईश्वरों का अनुकरण नहीं कर सकता, जो परम-शक्तिशाली हैं। भगवान् शिव ने समुद्र निगल जाने की सीमा तक विष पिया, किन्तु यदि कोई सामान्य मनुष्य ऐसे विष का एक अंश भी पीने का प्रयत्न करे, तो वह मारा जाएगा। भगवान् शिव के अनेक कूट-भक्त हैं जो गाँजा तथा इसी प्रकार के मादक द्रव्यों का सेवन करना चाहते हैं, और यह भूल जाते हैं कि इस प्रकार भगवान् शिव के कर्मों का अनुकरण करके वे मृत्यु को अत्यन्त निकट बुला रहे हैं। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के कुछ कूट-भक्त हैं जो भगवान् की रासलीला अर्थात् प्रेम-नृत्य में उनका अनुकरण करना पसन्द करते हैं, और गोवर्धन पर्वत उठाने की अपनी असमर्थता को भूल जाते हैं। अतएव सर्वोत्तम यही है कि मनुष्य शक्तिशालियों का अनुकरण करने का प्रयत्न न करे, अपितु केवल उनके निर्देशों का पालन करे; न ही उसे योग्यता बिना उनके पदों को ग्रहण करने का प्रयत्न करना चाहिए। परम भगवत्ता की शक्ति बिना ईश्वर के ऐसे अनेक “अवतार” हैं।