हि

अध्याय 3 · 25 / 43

3.25

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ २५ ॥

सक्ताः—आसक्त होकर; कर्मणि—विहित कर्तव्यों में; अविद्वांसः—अज्ञानी जन; यथा—जिस प्रकार; कुर्वन्ति—करते हैं; भारत—हे भरतवंशी; कुर्यात्—करना चाहिए; विद्वान्—विद्वान; तथा—उसी प्रकार; असक्तः—आसक्ति रहित; चिकीर्षुः—इच्छुक होकर; लोक-संग्रहम्—सामान्य जनता का नेतृत्व करने का।

जिस प्रकार अज्ञानी जन फलों के प्रति आसक्त होकर अपने कर्तव्य करते हैं, उसी प्रकार विद्वान भी कर्म कर सकते हैं, किन्तु आसक्ति बिना, लोगों को उचित मार्ग पर ले जाने के निमित्त।

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तथा कृष्णभावना से रहित व्यक्ति भिन्न इच्छाओं के द्वारा एक-दूसरे से पृथक् होते हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऐसा कुछ नहीं करता जो कृष्णभावनामृत के विकास के लिए अनुकूल न हो। वह उस अज्ञानी व्यक्ति की भाँति भी कर्म कर सकता है, जो भौतिक कर्मों में अत्यधिक आसक्त है, किन्तु एक अपनी इन्द्रियतृप्ति की संतुष्टि के लिए ऐसे कर्मों में संलग्न होता है, जबकि दूसरा श्रीकृष्ण की संतुष्टि के लिए। अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति से अपेक्षित है कि वह लोगों को दिखाए कि किस प्रकार कर्म किया जाए और कृष्णभावनामृत के प्रयोजन हेतु कर्म के फलों को किस प्रकार प्रवृत्त किया जाए।