अध्याय 3 · 27 / 43
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प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥
प्रकृतेः—भौतिक प्रकृति के; क्रियमाणानि—किए जाने वाले; गुणैः—गुणों द्वारा; कर्माणि—कर्म; सर्वशः—सब प्रकार के; अहंकार-विमूढ—मिथ्या अहंकार से मोहित; आत्मा—आत्मा; कर्ता—कर्ता; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; मन्यते—मानता है।
मिथ्या अहंकार से मोहित आत्मा प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में अपने आपको उन कर्मों का कर्ता मानता है, जो वस्तुतः प्रकृति द्वारा किए जाते हैं।
दो व्यक्ति, एक कृष्णभावनामृत में और दूसरा भौतिक चेतना में, एक ही स्तर पर कर्म करते हुए, एक ही धरातल पर कर्मरत प्रतीत हो सकते हैं, किन्तु उनकी अपनी-अपनी स्थितियों में गहरा अन्तर होता है। भौतिक चेतना वाला व्यक्ति मिथ्या अहंकार से यह मान बैठता है कि वही सब कुछ का कर्ता है। वह यह नहीं जानता कि शरीर का यन्त्र भौतिक प्रकृति द्वारा उत्पन्न होता है, जो परमेश्वर के निरीक्षण में कार्य करती है। भौतिकतावादी व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं है कि अन्ततः वह श्रीकृष्ण के नियन्त्रण में है। मिथ्या अहंकार में स्थित व्यक्ति सब कुछ स्वतन्त्र रूप से करने का समस्त श्रेय लेता है, और यही उसकी अविद्या का लक्षण है। वह यह नहीं जानता कि यह स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश से भौतिक प्रकृति की रचना है, और इसी कारण उसके शारीरिक एवं मानसिक कर्म श्रीकृष्ण की सेवा में, कृष्णभावनामृत में, संलग्न होने चाहिए। अज्ञानी मनुष्य यह भूल जाता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हृषीकेश अर्थात् भौतिक शरीर की इन्द्रियों के स्वामी के रूप में विख्यात हैं, क्योंकि इन्द्रियतृप्ति में इन्द्रियों के दीर्घकालीन दुरुपयोग के कारण वह वस्तुतः मिथ्या अहंकार से मोहित हो जाता है, जो उसे श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को भुला देता है।