हि

अध्याय 3 · 28 / 43

3.28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥

तत्त्ववित्—परम सत्य का ज्ञाता; तु—किन्तु; महा-बाहो—हे महाबाहु; गुण-कर्म—भौतिक प्रभाव में किए गए कर्म; विभागयोः—भेद; गुणाः—इन्द्रियाँ; गुणेषु—इन्द्रियतृप्ति में; वर्तन्ते—संलग्न होकर; इति—इस प्रकार; मत्वा—मानकर; न—कभी नहीं; सज्जते—आसक्त होता है।

हे महाबाहु, जो परम सत्य का ज्ञाता है, वह भक्ति में किए गए कर्म तथा सकाम फल हेतु किए गए कर्म के भेद को भली-भाँति जानते हुए अपने आपको इन्द्रियों एवं इन्द्रियतृप्ति में संलग्न नहीं करता।

परम सत्य का ज्ञाता भौतिक संगति में अपनी विषम स्थिति के विषय में आश्वस्त रहता है। वह जानता है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का अंश-स्वरूप है, और उसकी स्थिति भौतिक सृष्टि में नहीं होनी चाहिए। वह परमेश्वर के अंश-स्वरूप के रूप में अपनी वास्तविक पहचान को जानता है, जो नित्य आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं, और वह अनुभव करता है कि किसी न किसी प्रकार वह जीवन की भौतिक धारणा में फँस गया है। अपनी शुद्ध अस्तित्व-अवस्था में वह अपने कर्मों को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति में संलग्न करने के लिए नियत है। अतएव वह अपने आपको कृष्णभावनामृत के कर्मों में संलग्न करता है और स्वभावतः भौतिक इन्द्रियों के कर्मों के प्रति अनासक्त हो जाता है, जो सब परिस्थितिजन्य एवं अस्थायी हैं। वह जानता है कि उसकी भौतिक जीवन-स्थिति भगवान् के परम नियन्त्रण में है; परिणामस्वरूप वह सब प्रकार की भौतिक प्रतिक्रियाओं से विचलित नहीं होता, जिन्हें वह भगवान् की कृपा मानता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, जो परम सत्य को तीन भिन्न रूपों में — अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में — जानता है, वह तत्त्ववित् कहलाता है, क्योंकि वह परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में अपनी वास्तविक स्थिति को भी जानता है।