अध्याय 3 · 29 / 43
3.29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥
प्रकृतेः—भौतिक गुणों से प्रेरित; गुण-संमूढाः—भौतिक तादात्म्य से मूढ़; सज्जन्ते—संलग्न हो जाते हैं; गुण-कर्मसु—भौतिक कर्मों में; तान्—उन सब को; अकृत्स्न-विदः—अल्पज्ञ व्यक्ति; मन्दान्—आत्म-साक्षात्कार को समझने में आलसी; कृत्स्न-वित्—जो वास्तविक ज्ञान में स्थित है; न—न; विचालयेत्—विचलित करने का प्रयत्न करे।
भौतिक प्रकृति के गुणों से मोहित होकर अज्ञानी जन भौतिक कर्मों में पूर्णतः संलग्न हो जाते हैं और आसक्त हो जाते हैं। किन्तु बुद्धिमान को उन्हें विचलित नहीं करना चाहिए, यद्यपि कर्ताओं के ज्ञानाभाव के कारण ये कर्तव्य निम्न कोटि के होते हैं।
जो व्यक्ति अज्ञानी हैं, वे मिथ्या रूप से स्थूल भौतिक चेतना से तादात्म्य कर लेते हैं और भौतिक उपाधियों से पूर्ण होते हैं। यह शरीर भौतिक प्रकृति का उपहार है, और जो बहुत अधिक देहात्म-बुद्धि में आसक्त है, उसे मन्दान् अर्थात् आत्मा की समझ बिना आलसी व्यक्ति कहा जाता है। अज्ञानी मनुष्य शरीर को ही आत्मा मानते हैं; शरीर के साथ अन्यों के सम्बन्धों को नातेदारी के रूप में स्वीकार करते हैं; जिस भूमि में शरीर प्राप्त हुआ है, उसे आराध्य मानते हैं; और धार्मिक कर्मकाण्डों की औपचारिकताओं को अपने आप में साध्य मानते हैं। समाज-सेवा, राष्ट्रवाद तथा परोपकार ऐसे भौतिक उपाधि-ग्रस्त व्यक्तियों के कुछ कर्म हैं। ऐसी उपाधियों के वशीभूत होकर वे सदा भौतिक क्षेत्र में व्यस्त रहते हैं; उनके लिए आध्यात्मिक साक्षात्कार एक मिथक है, और इसलिए वे उसमें रुचि नहीं लेते। ऐसे मोहित व्यक्ति अहिंसा तथा इसी प्रकार के भौतिक रूप से हितकारी कर्म जैसे जीवन के प्राथमिक नैतिक सिद्धान्तों में भी संलग्न हो सकते हैं। तथापि जो आध्यात्मिक जीवन में प्रबुद्ध हैं, उन्हें ऐसे भौतिकता में निमग्न व्यक्तियों को विचलित करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। उत्तम यही है कि मनुष्य अपने आध्यात्मिक कर्मों को मौन भाव से सम्पन्न करता रहे।
जो मनुष्य अज्ञानी हैं, वे कृष्णभावनामृत के कर्मों की सराहना नहीं कर सकते, और इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण हमें परामर्श देते हैं कि हम उन्हें विचलित न करें और बहुमूल्य समय व्यर्थ न गँवाएँ। किन्तु भगवान् के भक्तगण स्वयं भगवान् से अधिक कृपालु होते हैं, क्योंकि वे भगवान् के प्रयोजन को समझते हैं। परिणामस्वरूप वे सब प्रकार के जोखिम उठाते हैं, यहाँ तक कि अज्ञानी मनुष्यों के समीप जाकर उन्हें कृष्णभावनामृत के कर्मों में संलग्न करने का प्रयत्न करने तक, जो मनुष्य के लिए नितान्त आवश्यक हैं।