हि

अध्याय 3 · 30 / 43

3.30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥

मयि—मुझमें; सर्वाणि—सब प्रकार के; कर्माणि—कर्म; सन्न्यस्य—पूर्णतः त्यागकर; अध्यात्म—आत्मा के पूर्ण ज्ञान सहित; चेतसा—चेतना से; निराशीः—लाभ की इच्छा बिना; निर्ममः—स्वामित्व बिना; भूत्वा—होकर; युध्यस्व—युद्ध करो; विगत-ज्वरः—आलस्य रहित होकर।

अतएव हे अर्जुन, अपने समस्त कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मुझमें मन लगाकर, लाभ की इच्छा बिना तथा अहंकार एवं आलस्य से मुक्त होकर युद्ध करो।

यह श्लोक स्पष्ट रूप से भगवद्गीता के प्रयोजन को इंगित करता है। भगवान् शिक्षा देते हैं कि मनुष्य को सैन्य अनुशासन की भाँति कर्तव्यों के निर्वाह हेतु पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होना है। ऐसा विधान वस्तुओं को कुछ कठिन बना सकता है; तथापि कर्तव्यों का निर्वाह श्रीकृष्ण पर निर्भर होकर अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यही जीव की स्वरूपगत स्थिति है। जीव परमेश्वर के सहयोग से स्वतन्त्र होकर सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि जीव की नित्य स्वरूपगत स्थिति भगवान् की इच्छाओं के अधीन होना है। अतः अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा आदेश दिया गया कि वह इस प्रकार युद्ध करे मानो भगवान् उसके सेनापति हों। मनुष्य को परमेश्वर की सद्भावना के लिए सब कुछ बलिदान करना है, और साथ ही स्वामित्व का दावा किए बिना विहित कर्तव्यों का निर्वाह करना है। अर्जुन को भगवान् के आदेश पर विचार नहीं करना था; उसे केवल उनके आदेश का पालन करना था। परमेश्वर समस्त आत्माओं की आत्मा हैं; अतएव जो व्यक्तिगत विचार बिना केवल और पूर्णतः परमात्मा पर निर्भर रहता है, अथवा दूसरे शब्दों में, जो पूर्णतः कृष्णभावनाभावित है, वह अध्यात्म-चेतसा कहलाता है। निराशीः का अर्थ है कि मनुष्य को स्वामी के आदेश पर कर्म करना है। न ही मनुष्य को कभी सकाम फल की अपेक्षा करनी चाहिए। कोषाध्यक्ष अपने नियोक्ता के लिए लाखों मुद्राएँ गिन सकता है, किन्तु वह अपने लिए एक पैसे का भी दावा नहीं करता। इसी प्रकार मनुष्य को यह अनुभव करना है कि संसार में कोई वस्तु किसी व्यक्ति-विशेष की नहीं है, अपितु सब कुछ परमेश्वर का है। यही मयि अर्थात् “मुझमें” का वास्तविक तात्पर्य है। और जब मनुष्य ऐसे कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह निश्चय ही किसी भी वस्तु पर स्वामित्व का दावा नहीं करता। इस चेतना को निर्मम अर्थात् “कुछ भी मेरा नहीं है” कहा जाता है। और यदि देह-सम्बन्ध में तथाकथित नातेदारों के विचार बिना ऐसे कठोर आदेश के पालन में कोई हिचकिचाहट हो, तो उस हिचकिचाहट को त्याग देना चाहिए; इस प्रकार मनुष्य विगत-ज्वर अर्थात् ज्वरयुक्त मनोवृत्ति अथवा आलस्य से रहित हो सकता है। प्रत्येक मनुष्य के पास, अपने गुण एवं स्थिति के अनुसार, निर्वाह करने योग्य एक विशेष प्रकार का कर्म होता है, और ऐसे समस्त कर्तव्य उपर्युक्त रीति से कृष्णभावनामृत में निर्वाह किए जा सकते हैं। यह मनुष्य को मोक्ष के पथ की ओर ले जाएगा।