हि

अध्याय 3 · 6 / 43

3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥

कर्म-इन्द्रियाणि—पाँच कर्मेन्द्रियाँ; संयम्य—संयमित करके; यः—जो कोई; आस्ते—रहता है; मनसा—मन से; स्मरन्—स्मरण करता हुआ; इन्द्रिय-अर्थान्—इन्द्रिय-विषयों का; विमूढ—मूर्ख; आत्मा—आत्मा; मिथ्या-आचारः—ढोंगी; सः—वह; उच्यते—कहलाता है।

जो इन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को संयमित कर लेता है, किन्तु जिसका मन इन्द्रिय-विषयों में रमा रहता है, वह निश्चय ही स्वयं को धोखा देता है और ढोंगी कहलाता है।

ऐसे अनेक ढोंगी हैं जो कृष्णभावनामृत में कर्म करने से इनकार करते हैं, किन्तु ध्यान का प्रदर्शन करते हैं, जबकि वास्तव में मन के भीतर इन्द्रिय-भोग का चिन्तन करते रहते हैं। ऐसे ढोंगी सुसंस्कृत अनुयायियों को छलने के लिए शुष्क दर्शन पर भी बोल सकते हैं, किन्तु इस श्लोक के अनुसार ये सबसे बड़े छली हैं। इन्द्रिय-भोग के लिए मनुष्य सामाजिक व्यवस्था के किसी भी पद पर कर्म कर सकता है, किन्तु यदि कोई अपनी विशिष्ट स्थिति के नियमों एवं विधानों का पालन करता है, तो वह अपने अस्तित्व को शुद्ध करने में क्रमशः प्रगति कर सकता है। किन्तु जो योगी होने का प्रदर्शन करता है, जबकि वास्तव में इन्द्रिय-तृप्ति के विषयों की खोज में रहता है, उसे सबसे बड़ा छली कहा जाना चाहिए, यद्यपि वह कभी-कभी दर्शन की बात करता है। उसके ज्ञान का कोई मूल्य नहीं, क्योंकि ऐसे पापी मनुष्य के ज्ञान के फल भगवान् की माया-शक्ति द्वारा हर लिए जाते हैं। ऐसे ढोंगी का मन सदा अशुद्ध रहता है, और इसलिए उसके योगिक ध्यान के प्रदर्शन का कोई भी मूल्य नहीं।