हि

अध्याय 3 · 7 / 43

3.7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥

यः—जो; तु—किन्तु; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; मनसा—मन के द्वारा; नियम्य—नियन्त्रित करके; आरभते—आरम्भ करता है; अर्जुन—हे अर्जुन; कर्म-इन्द्रियैः—कर्मेन्द्रियों के द्वारा; कर्म-योगम्—भक्ति; असक्तः—आसक्ति रहित; सः—वह; विशिष्यते—कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

दूसरी ओर, जो मन के द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है और अपनी कर्मेन्द्रियों को आसक्ति रहित होकर भक्ति के कार्यों में संलग्न करता है, वह कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

उच्छृंखल जीवन तथा इन्द्रिय-भोग के लिए छद्म-योगी बनने की अपेक्षा, अपने ही व्यवसाय में स्थित रहकर जीवन के प्रयोजन को पूर्ण करना कहीं श्रेष्ठतर है, और वह प्रयोजन है भौतिक बन्धन से मुक्त होकर भगवद्धाम में प्रवेश करना। प्रमुख स्वार्थ-गति, अर्थात् स्व-हित का लक्ष्य, विष्णु तक पहुँचना है। वर्ण तथा आश्रम की समूची संस्था हमें जीवन के इसी लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करने हेतु रची गई है। गृहस्थ भी कृष्णभावनामृत में नियमित सेवा के द्वारा इस गन्तव्य तक पहुँच सकता है। आत्म-साक्षात्कार हेतु, मनुष्य शास्त्रों में विहित संयमित जीवन व्यतीत कर सकता है और आसक्ति रहित होकर अपना व्यवसाय चलाता रह सकता है, और इस प्रकार प्रगति कर सकता है। ऐसा निष्ठावान् व्यक्ति, जो इस विधि का पालन करता है, उस मिथ्या ढोंगी से कहीं उत्तम स्थिति में है, जो भोले-भाले जनसमुदाय को छलने के लिए दिखावटी अध्यात्मवाद अपनाता है। सड़क पर झाड़ू लगाने वाला एक निष्ठावान् सफाईकर्मी उस कपटी ध्यानी से कहीं श्रेष्ठ है, जो केवल जीविकोपार्जन के लिए ध्यान का स्वाँग करता है।