हि

अध्याय 3 · 8 / 43

3.8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥

नियतम्—विहित; कुरु—करो; कर्म—कर्तव्य; त्वम्—तुम; कर्म—कर्म; ज्यायः—श्रेष्ठ; हि—से; अकर्मणः—बिना कर्म के; शरीर—शारीरिक; यात्रा—निर्वाह; अपि—भी; च—भी; ते—तुम्हारा; न—कभी नहीं; प्रसिद्ध्येत्—सम्पन्न होगा; अकर्मणः—बिना कर्म के।

अपने विहित कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है। कर्म के बिना मनुष्य अपने भौतिक शरीर का निर्वाह तक नहीं कर सकता।

ऐसे अनेक छद्म-ध्यानी हैं जो स्वयं को उच्च कुलोत्पन्न होने का मिथ्या परिचय देते हैं, तथा अनेक बड़े व्यवसायी हैं जो यह झूठा ढोंग रचते हैं कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन में उन्नति हेतु सब कुछ त्याग दिया है। भगवान् श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि अर्जुन ढोंगी बने, अपितु यह कि वह क्षत्रियों के लिए निर्धारित अपने विहित कर्तव्यों का पालन करे। अर्जुन एक गृहस्थ तथा एक सैन्य सेनापति था, और इसलिए उसके लिए वैसा ही बने रहना तथा गृहस्थ क्षत्रिय के लिए विहित अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना श्रेष्ठतर था। ऐसे कर्म एक सांसारिक मनुष्य के हृदय को क्रमशः शुद्ध कर देते हैं और उसे भौतिक कल्मष से मुक्त कर देते हैं। निर्वाह के उद्देश्य से किया जाने वाला तथाकथित त्याग न तो भगवान् द्वारा कभी अनुमोदित है और न ही किसी धार्मिक शास्त्र द्वारा। अन्ततः, मनुष्य को किसी न किसी कर्म के द्वारा अपने शरीर एवं आत्मा को एक साथ बनाए रखना ही पड़ता है। भौतिकतावादी प्रवृत्तियों की शुद्धि के बिना, कर्म को मनमाने ढंग से नहीं त्यागना चाहिए। जो कोई भी भौतिक जगत् में है, वह निश्चय ही भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की, अथवा दूसरे शब्दों में, इन्द्रिय-तृप्ति की अशुद्ध प्रवृत्ति से युक्त है। ऐसी कलुषित प्रवृत्तियों का निवारण होना आवश्यक है। विहित कर्तव्यों के द्वारा ऐसा किए बिना, मनुष्य को कभी भी कर्म त्यागकर तथा दूसरों के व्यय पर जीवन-यापन करते हुए तथाकथित अध्यात्मवादी बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।