अध्याय 4 · 10 / 42
4.10
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥
वीत—से मुक्त; राग—आसक्ति; भय—भय; क्रोधाः—क्रोध; मत्-मया—पूर्णतः मुझमें; माम्—मुझमें; उपाश्रिताः—पूर्णतः स्थित होकर; बहवः—अनेक; ज्ञान—ज्ञान; तपसा—तपस्या द्वारा; पूताः—पवित्र होकर; मत्-भावम्—मेरे प्रति दिव्य प्रेम; आगताः—प्राप्त किया।
आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतः लीन होकर तथा मेरी शरण लेकर, अतीत में अनेकानेक व्यक्ति मेरे ज्ञान से पवित्र हो गए—और इस प्रकार उन सबने मेरे प्रति दिव्य प्रेम प्राप्त किया।
जैसा कि ऊपर वर्णित है, जो व्यक्ति अत्यधिक भौतिक रूप से प्रभावित है, उसके लिए परम सत्य के साकार स्वरूप को समझना अति कठिन है। सामान्यतः जो लोग जीवन की देहात्म-बुद्धि में आसक्त हैं, वे भौतिकवाद में इतने लीन रहते हैं कि उनके लिए यह समझना प्रायः असम्भव हो जाता है कि एक दिव्य शरीर भी है जो अविनाशी, ज्ञान से परिपूर्ण तथा नित्य आनन्दमय है। भौतिकवादी धारणा में शरीर नश्वर, अज्ञान से परिपूर्ण तथा पूर्णतः दुःखमय है। अतः जब जनसामान्य को भगवान् के साकार रूप के विषय में बताया जाता है, तब वे यही देहात्म-बुद्धि मन में रखते हैं। ऐसे भौतिकवादी मनुष्यों के लिए विराट् भौतिक प्रकटीकरण का रूप ही परम है। फलस्वरूप वे परमेश्वर को निराकार मानते हैं। और चूँकि वे अत्यधिक भौतिक रूप से लीन हैं, अतः पदार्थ से मुक्ति के पश्चात् भी व्यक्तित्व बनाए रखने की धारणा उन्हें भयभीत करती है। जब उन्हें बताया जाता है कि आध्यात्मिक जीवन भी वैयक्तिक तथा साकार है, तब वे पुनः व्यक्ति बनने से डरने लगते हैं, और इस प्रकार वे स्वाभाविक रूप से एक प्रकार के निराकार शून्य में विलीन होने को प्राथमिकता देते हैं। सामान्यतः वे जीवों की तुलना समुद्र के बुलबुलों से करते हैं, जो समुद्र में विलीन हो जाते हैं। यही व्यक्तिगत व्यक्तित्व के बिना प्राप्य आध्यात्मिक अस्तित्व की उच्चतम पूर्णता है। यह जीवन की एक प्रकार की भयपूर्ण अवस्था है, जो आध्यात्मिक अस्तित्व के पूर्ण ज्ञान से रहित है। इसके अतिरिक्त ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो आध्यात्मिक अस्तित्व को तनिक भी नहीं समझ सकते। अनेक सिद्धान्तों तथा विविध प्रकार की दार्शनिक कल्पनाओं के विरोधाभासों से उद्विग्न होकर, वे विरक्त अथवा क्रुद्ध हो जाते हैं और मूर्खतापूर्वक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कोई परम कारण नहीं है तथा अन्ततः सब कुछ शून्य है। ऐसे लोग जीवन की रुग्ण अवस्था में हैं। कुछ लोग अत्यधिक भौतिक रूप से आसक्त हैं और अतः आध्यात्मिक जीवन पर ध्यान नहीं देते; उनमें से कुछ परम आध्यात्मिक कारण में विलीन होना चाहते हैं; और उनमें से कुछ हर वस्तु में अविश्वास करते हैं, निराशा के कारण सब प्रकार की आध्यात्मिक कल्पना पर क्रुद्ध रहते हुए। यह अन्तिम वर्ग के लोग किसी प्रकार के नशे की शरण लेते हैं, और उनके भावमय विभ्रम कभी-कभी आध्यात्मिक दर्शन के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं। मनुष्य को भौतिक जगत् के प्रति आसक्ति की तीनों अवस्थाओं से छुटकारा पाना होता है : आध्यात्मिक जीवन की उपेक्षा, आध्यात्मिक वैयक्तिक पहचान का भय, तथा शून्य की वह धारणा जो जीवन की कुण्ठा का आधार है। जीवन की भौतिक धारणा की इन तीनों अवस्थाओं से मुक्त होने हेतु, मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु द्वारा निर्देशित होकर भगवान् की पूर्ण शरण लेनी होती है, तथा भक्ति-जीवन के अनुशासनों एवं विधि-विधानों का पालन करना होता है। भक्ति-जीवन की अन्तिम अवस्था भाव, अर्थात् भगवान् के प्रति दिव्य प्रेम कहलाती है।
भक्ति-रसामृत-सिन्धु, अर्थात् भक्ति के विज्ञान के अनुसार :
ādau śraddhā tataḥ sādhu-saṅgo ‘tha bhajana-kriyā
tato ‘nartha-nivṛttiḥ syāt tato niṣṭhā rucis tataḥ
athāsaktis tato bhāvas tataḥ premābhyudañcati
sādhakānām ayaṁ premṇaḥ prādurbhāve bhavet kramaḥ.
“आरम्भ में मनुष्य में आत्म-साक्षात्कार की एक प्रारम्भिक इच्छा होनी चाहिए। यह मनुष्य को उन व्यक्तियों के संग का प्रयत्न करने की अवस्था तक ले आती है जो आध्यात्मिक रूप से उन्नत हैं। अगली अवस्था में मनुष्य किसी उन्नत आध्यात्मिक गुरु से दीक्षित होता है, और उनके निर्देश के अधीन नवदीक्षित भक्त भक्ति की प्रक्रिया आरम्भ करता है। आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति का सम्पादन करते हुए, मनुष्य समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त हो जाता है, आत्म-साक्षात्कार में स्थिरता प्राप्त करता है, तथा परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करने का स्वाद अर्जित करता है। यह स्वाद मनुष्य को आगे कृष्णभावनामृत के प्रति आसक्ति की ओर ले जाता है, जो भाव, अर्थात् भगवान् के प्रति दिव्य प्रेम की प्रारम्भिक अवस्था में परिपक्व होती है। ईश्वर के प्रति यथार्थ प्रेम प्रेम कहलाता है, जो जीवन की उच्चतम पूर्णता की अवस्था है।” प्रेम की अवस्था में भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्नता रहती है। इस प्रकार, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति की मन्द प्रक्रिया द्वारा, मनुष्य उच्चतम अवस्था प्राप्त कर सकता है, समस्त भौतिक आसक्ति से, अपनी वैयक्तिक आध्यात्मिक पहचान के भय से, तथा शून्यवाद से उत्पन्न कुण्ठाओं से मुक्त होकर। तत्पश्चात् मनुष्य अन्ततः परमेश्वर के धाम को प्राप्त कर सकता है।