अध्याय 4 · 11 / 42
4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
ये—वे सब; यथा—जिस प्रकार; माम्—मुझको; प्रपद्यन्ते—शरण लेते हैं; तान्—उन्हें; तथा—उसी प्रकार; एव—निश्चय ही; भजामि—मैं फल देता हूँ; अहम्—मैं; मम—मेरे; वर्त्म—मार्ग का; अनुवर्तन्ते—अनुसरण करते हैं; मनुष्याः—समस्त मनुष्य; पार्थ—हे पृथापुत्र; सर्वशः—सब प्रकार से।
वे सब जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, उसी प्रकार मैं उन्हें फल देता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करता है, हे पृथापुत्र।
प्रत्येक व्यक्ति श्रीकृष्ण को उनके प्रकटीकरणों के भिन्न-भिन्न पक्षों में खोज रहा है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की आंशिक अनुभूति उनकी निराकार ब्रह्मज्योति-प्रभा में तथा प्रत्येक वस्तु के भीतर, परमाणुओं के कणों सहित, निवास करने वाले सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में होती है। किन्तु श्रीकृष्ण की पूर्ण अनुभूति केवल उनके शुद्ध भक्तों द्वारा होती है। फलस्वरूप श्रीकृष्ण प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति के विषय हैं, और इस प्रकार कोई भी और प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पाने की अपनी इच्छा के अनुसार सन्तुष्ट होता है। दिव्य जगत् में भी श्रीकृष्ण अपने शुद्ध भक्तों के साथ दिव्य भाव में, ठीक जैसे भक्त उन्हें चाहता है, वैसे ही व्यवहार करते हैं। एक भक्त श्रीकृष्ण को परम स्वामी के रूप में चाह सकता है, दूसरा अपने व्यक्तिगत मित्र के रूप में, अन्य अपने पुत्र के रूप में, तथा अन्य अपने प्रेमी के रूप में। श्रीकृष्ण समस्त भक्तों को उनके प्रति उनके प्रेम की भिन्न-भिन्न तीव्रताओं के अनुसार समान रूप से फल देते हैं। भौतिक जगत् में भी भावनाओं का वही आदान-प्रदान विद्यमान है, और भगवान् भिन्न-भिन्न प्रकार के उपासकों के साथ उनका समान रूप से विनिमय करते हैं। शुद्ध भक्त, यहाँ तथा दिव्य धाम दोनों में, उनके साथ साक्षात् संग करते हैं और भगवान् की वैयक्तिक सेवा कर पाते हैं, तथा इस प्रकार उनकी प्रेममयी सेवा में दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं। जो निर्विशेषवादी हैं और जो जीव के वैयक्तिक अस्तित्व का विनाश करके आध्यात्मिक आत्महत्या करना चाहते हैं, उनकी भी श्रीकृष्ण उन्हें अपनी प्रभा में लीन करके सहायता करते हैं। ऐसे निर्विशेषवादी नित्य, आनन्दमय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को स्वीकार करने पर सहमत नहीं होते; फलस्वरूप वे अपने व्यक्तित्व को मिटा देने के कारण भगवान् की दिव्य वैयक्तिक सेवा के आनन्द का आस्वादन नहीं कर पाते। उनमें से कुछ, जो निराकार अस्तित्व में भी स्थित नहीं होते, क्रियाओं के प्रति अपनी सुप्त इच्छाओं को प्रकट करने हेतु इस भौतिक क्षेत्र में लौट आते हैं। उन्हें आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश नहीं मिलता, अपितु उन्हें पुनः भौतिक लोकों पर कर्म करने का अवसर दिया जाता है। जो सकाम कर्मी हैं, उन्हें भगवान् यज्ञेश्वर के रूप में उनके विहित कर्तव्यों के अभीष्ट फल प्रदान करते हैं; और जो योगी सिद्धियाँ चाहते हैं, उन्हें वैसी सिद्धियाँ प्रदान की जाती हैं। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति सफलता हेतु केवल उन्हीं की कृपा पर निर्भर है, और सभी प्रकार की आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ उसी एक मार्ग पर सफलता की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ मात्र हैं। अतः जब तक मनुष्य कृष्णभावनामृत की उच्चतम पूर्णता तक नहीं पहुँचता, तब तक समस्त प्रयास अपूर्ण रहते हैं, जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा गया है :
akāmaḥ sarva-kāmo vā mokṣa-kāma udāradhīḥ
tīvreṇa bhakti-yogena yajeta puruṣaṁ param
“चाहे मनुष्य इच्छारहित हो [भक्तों की स्थिति], अथवा समस्त सकाम फलों का इच्छुक हो, अथवा मुक्ति का अभिलाषी हो, उसे पूर्ण पूर्णता हेतु, जिसकी पराकाष्ठा कृष्णभावनामृत में है, समस्त प्रयासों से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आराधना करनी चाहिए।” (भा. 2.3.10)