हि

अध्याय 4 · 9 / 42

4.9

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥

जन्म—जन्म; कर्म—कर्म; च—भी; मे—मेरे; दिव्यम्—दिव्य; एवम्—इस प्रकार; यः—जो कोई; वेत्ति—जानता है; तत्त्वतः—यथार्थ रूप में; त्यक्त्वा—त्यागकर; देहम्—इस शरीर को; पुनः—फिर; जन्म—जन्म; न—कभी नहीं; एति—प्राप्त करता है; माम्—मुझको; एति—प्राप्त करता है; सः—वह; अर्जुन—हे अर्जुन।

जो मेरे आविर्भाव तथा कर्मों के दिव्य स्वरूप को जानता है, वह शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है, हे अर्जुन।

भगवान् का अपने दिव्य धाम से अवतरण छठे श्लोक में पहले ही समझाया जा चुका है। जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आविर्भाव के सत्य को समझ सकता है, वह भौतिक बन्धन से पहले ही मुक्त है, अतः वह इस वर्तमान भौतिक शरीर को त्यागने के तुरन्त पश्चात् भगवद्धाम लौट जाता है। जीव की भौतिक बन्धन से ऐसी मुक्ति तनिक भी सरल नहीं है। निर्विशेषवादी तथा योगीगण अनेक कष्टों एवं अनेकानेक जन्मों के पश्चात् ही मुक्ति प्राप्त करते हैं। तब भी, उन्हें जो मुक्ति प्राप्त होती है—भगवान् के निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन होना—वह आंशिक मात्र है, और इस भौतिक जगत् में पुनः लौटने का जोखिम बना रहता है। किन्तु भक्त, भगवान् के शरीर तथा कर्मों के दिव्य स्वरूप को मात्र समझकर, इस शरीर के अन्त के पश्चात् भगवद्धाम प्राप्त करता है और इस भौतिक जगत् में पुनः लौटने का जोखिम नहीं उठाता। ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि भगवान् के अनेकानेक रूप तथा अवतार हैं : advaitam acyutam anādim ananta-rūpam। यद्यपि भगवान् के अनेक दिव्य रूप हैं, फिर भी वे सब एक ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। मनुष्य को इस तथ्य को दृढ़ विश्वास के साथ समझना चाहिए, यद्यपि यह सांसारिक विद्वानों तथा अनुभववादी दार्शनिकों के लिए अबोधगम्य है। जैसा कि वेदों में कहा गया है :

eko devo nitya-līlānurakto bhakta-vyāpī hṛdy antarātmā.

“वे एकमात्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने अनन्य भक्तों के साथ सम्बन्धों में अनेकानेक दिव्य रूपों में नित्य संलग्न रहते हैं।” इस वैदिक कथन की पुष्टि गीता के इस श्लोक में स्वयं भगवान् द्वारा की गई है। जो वेदों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रामाण्य के बल पर इस सत्य को स्वीकार करता है और जो दार्शनिक कल्पनाओं में समय नष्ट नहीं करता, वह मुक्ति की उच्चतम पूर्णता की अवस्था प्राप्त करता है। इस सत्य को मात्र श्रद्धापूर्वक स्वीकार करके, मनुष्य नि:सन्देह मुक्ति प्राप्त कर सकता है। वैदिक कथन “tattvamasi” वस्तुतः इसी स्थिति में लागू होता है। जो कोई भगवान् श्रीकृष्ण को परम के रूप में समझता है, अथवा जो भगवान् से कहता है, “आप ही वही परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं,” वह निश्चय ही तत्काल मुक्त हो जाता है, और फलस्वरूप भगवान् की दिव्य संगति में उसका प्रवेश सुनिश्चित है। दूसरे शब्दों में, भगवान् का ऐसा श्रद्धालु भक्त पूर्णता प्राप्त करता है, और इसकी पुष्टि निम्नलिखित वैदिक कथन से होती है :

tam eva viditvātimṛtyumeti nānyaḥ panthā vidyate ayanāya.

मनुष्य भगवान्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को मात्र जानकर ही जन्म-मृत्यु से मुक्ति की पूर्ण अवस्था प्राप्त कर सकता है। इसका कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि जो कोई भगवान् श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में नहीं समझता, वह निश्चय ही अज्ञान के गुण में है। फलस्वरूप वह मुक्ति प्राप्त नहीं करेगा, मानो, यों कहें, मधु की बोतल की बाहरी सतह को चाटकर, अथवा भगवद्गीता की सांसारिक विद्वत्ता के अनुसार व्याख्या करके। ऐसे अनुभववादी दार्शनिक भौतिक जगत् में अति महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ ग्रहण कर सकते हैं, किन्तु वे आवश्यक रूप से मुक्ति के पात्र नहीं हैं। ऐसे अहंकारग्रस्त सांसारिक विद्वानों को भगवान् के भक्त की अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। अतः मनुष्य को श्रद्धा एवं ज्ञान के साथ कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करना चाहिए, और इस प्रकार पूर्णता प्राप्त करनी चाहिए।