अध्याय 4 · 12 / 42
4.12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
काङ्क्षन्तः—इच्छा करते हुए; कर्मणाम्—सकाम क्रियाओं की; सिद्धिम्—सिद्धि; यजन्ते—यज्ञों द्वारा आराधना करते हैं; इह—भौतिक जगत् में; देवताः—देवताओं की; क्षिप्रम्—अति शीघ्र; हि—निश्चय ही; मानुषे—मानव-समाज में; लोके—इस संसार में; सिद्धिः भवति—सफल होता है; कर्मजा—सकाम कर्मी।
इस संसार में मनुष्य सकाम क्रियाओं में सफलता की इच्छा करते हैं, और अतः वे देवताओं की आराधना करते हैं। निस्सन्देह मनुष्य इस संसार में सकाम कर्म से शीघ्र फल प्राप्त करते हैं।
इस भौतिक जगत् के देवों अथवा देवताओं के विषय में एक महान् भ्रान्ति है, और अल्पबुद्धि मनुष्य, यद्यपि वे महान् विद्वान् के रूप में प्रसिद्ध हैं, इन देवताओं को परमेश्वर के विविध रूप मान लेते हैं। वास्तव में देवता ईश्वर के भिन्न-भिन्न रूप नहीं हैं, अपितु वे ईश्वर के भिन्न-भिन्न अंश हैं। ईश्वर एक है, और अंश अनेक हैं। वेद कहते हैं, nityo nityānām : ईश्वर एक है। Īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ। परमेश्वर एक है—श्रीकृष्ण—और देवताओं को इस भौतिक जगत् के प्रबन्धन हेतु शक्तियाँ प्रत्यायोजित की गई हैं। ये देवता सभी भिन्न-भिन्न श्रेणियों की भौतिक शक्ति वाले जीव (nityānām) हैं। वे परमेश्वर—नारायण, विष्णु अथवा श्रीकृष्ण—के समान नहीं हो सकते। जो कोई यह सोचता है कि ईश्वर तथा देवता एक ही स्तर पर हैं, वह नास्तिक अथवा पाषण्डी कहलाता है। ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान् देवताओं की भी परमेश्वर से तुलना नहीं की जा सकती। वास्तव में भगवान् की आराधना ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवता करते हैं (śiva-viriñci-nutam)। फिर भी विचित्र रूप से अनेक मानव नेता ऐसे हैं जिनकी आराधना मूर्ख मनुष्य मानवरूपता अथवा पशुरूपता की भ्रान्ति के अधीन करते हैं। इह देवताः इस भौतिक जगत् के किसी शक्तिशाली मनुष्य अथवा देवता को इंगित करता है। किन्तु नारायण, विष्णु अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण इस जगत् के नहीं हैं। वे भौतिक सृष्टि से ऊपर, अथवा उससे परे, दिव्य हैं। निर्विशेषवादियों के नेता श्रीपाद शंकराचार्य भी मानते हैं कि नारायण, अथवा श्रीकृष्ण, इस भौतिक सृष्टि से परे हैं। तथापि मूर्ख लोग (hṛt-añjana) देवताओं की आराधना करते हैं, क्योंकि वे तत्काल फल चाहते हैं। उन्हें फल प्राप्त होते हैं, किन्तु वे नहीं जानते कि इस प्रकार प्राप्त फल क्षणिक हैं और अल्पबुद्धि व्यक्तियों के निमित्त हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति कृष्णभावनामृत में स्थित है, और उसे किसी तात्कालिक, क्षणिक लाभ हेतु तुच्छ देवताओं की आराधना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस भौतिक जगत् के देवता, तथा उनके उपासक भी, इस भौतिक जगत् के विनाश के साथ लुप्त हो जाएँगे। देवताओं के वरदान भौतिक तथा क्षणिक हैं। दोनों ही भौतिक जगत् तथा उनके निवासी, देवताओं सहित, तथा उनके उपासक, ब्रह्माण्डीय समुद्र में बुलबुले हैं। किन्तु इस जगत् में मानव-समाज भूमि, परिवार तथा भोग्य सामग्री के अधिकार जैसी क्षणिक वस्तुओं के पीछे उन्मत्त है। ऐसी क्षणिक वस्तुएँ प्राप्त करने हेतु वे देवताओं अथवा मानव-समाज के शक्तिशाली मनुष्यों की आराधना करते हैं। यदि कोई मनुष्य किसी राजनीतिक नेता की आराधना करके सरकार में कोई मन्त्री-पद प्राप्त कर लेता है, तो वह मानता है कि उसने एक महान् वरदान प्राप्त कर लिया है। अतः वे सभी क्षणिक वरदान प्राप्त करने हेतु तथाकथित नेताओं अथवा “बड़े लोगों” के समक्ष दण्डवत् होते हैं, और वे वास्तव में ऐसी वस्तुएँ प्राप्त कर भी लेते हैं। ऐसे मूर्ख मनुष्य भौतिक अस्तित्व के कष्टों के स्थायी समाधान हेतु कृष्णभावनामृत में रुचि नहीं रखते। वे सभी इन्द्रियभोग के पीछे हैं, और इन्द्रियभोग की थोड़ी-सी सुविधा प्राप्त करने हेतु वे देवता नामक सशक्त जीवों की आराधना करने को आकृष्ट होते हैं। यह श्लोक इंगित करता है कि लोग कृष्णभावनामृत में विरले ही रुचि रखते हैं। वे प्रायः भौतिक भोग में रुचि रखते हैं, और अतः वे किसी शक्तिशाली जीव की आराधना करते हैं।