हि

अध्याय 4 · 13 / 42

4.13

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥

चातुर्-वर्ण्यम्—मानव-समाज के चार विभाग; मया—मेरे द्वारा; सृष्टम्—रचित; गुण—गुण; कर्म—कर्म; विभागशः—विभाजन की दृष्टि से; तस्य—उसका; कर्तारम्—जनक; अपि—यद्यपि; माम्—मुझे; विद्धि—तुम जानो; अकर्तारम्—अकर्ता के रूप में; अव्ययम्—अपरिवर्तनशील होने के कारण।

प्रकृति के तीन गुणों तथा उनसे सम्बद्ध कर्म के अनुसार, मानव-समाज के चार विभाग मेरे द्वारा रचे गए। और, यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूँ, फिर भी तुम्हें जानना चाहिए कि मैं अपरिवर्तनशील होने के कारण अकर्ता हूँ।

भगवान् समस्त वस्तुओं के स्रष्टा हैं। प्रत्येक वस्तु उनसे जन्म लेती है, प्रत्येक वस्तु उनके द्वारा पोषित होती है, और विनाश के पश्चात् प्रत्येक वस्तु उन्हीं में विश्राम पाती है। अतः वे सामाजिक व्यवस्था के चार विभागों के स्रष्टा हैं, जिसका आरम्भ बुद्धिमान् वर्ग के मनुष्यों से होता है, जो सत्त्वगुण में स्थित होने के कारण तकनीकी रूप से ब्राह्मण कहलाते हैं। इसके पश्चात् प्रशासक वर्ग आता है, जो रजोगुण में स्थित होने के कारण तकनीकी रूप से क्षत्रिय कहलाता है। वणिक् वर्ग के मनुष्य, जो वैश्य कहलाते हैं, रजोगुण तथा तमोगुण के मिश्रित गुणों में स्थित हैं, और शूद्र, अर्थात् श्रमिक वर्ग, भौतिक प्रकृति के तमोगुण में स्थित हैं। मानव-समाज के चार विभागों की रचना करते हुए भी, भगवान् श्रीकृष्ण इनमें से किसी भी विभाग के नहीं हैं, क्योंकि वे बद्धजीवों में से एक नहीं हैं, जिनका एक भाग मानव-समाज की रचना करता है। मानव-समाज किसी अन्य पशु-समाज के समान ही है, किन्तु मनुष्यों को पशु-स्थिति से ऊपर उठाने हेतु, कृष्णभावनामृत के व्यवस्थित विकास के लिए उपर्युक्त विभाग भगवान् द्वारा रचे गए हैं। किसी विशेष मनुष्य की कर्म के प्रति प्रवृत्ति उन प्राकृतिक गुणों से निर्धारित होती है जिन्हें उसने अर्जित किया है। प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार जीवन के ऐसे लक्षण इस पुस्तक के अठारहवें अध्याय में वर्णित हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति ब्राह्मणों से भी ऊपर है, क्योंकि ब्राह्मण से गुण की दृष्टि से अपेक्षित है कि वह ब्रह्म, अर्थात् परम सत्य के विषय में जाने। उनमें से अधिकांश भगवान् श्रीकृष्ण के निराकार ब्रह्म-प्रकटीकरण के समीप पहुँचते हैं, किन्तु केवल वही मनुष्य, जो ब्राह्मण के सीमित ज्ञान को लाँघकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के ज्ञान तक पहुँचता है, कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति—अथवा, दूसरे शब्दों में, वैष्णव—बनता है। कृष्णभावनामृत में श्रीकृष्ण के समस्त भिन्न-भिन्न पूर्ण विस्तारों, अर्थात् राम, नृसिंह, वराह आदि का ज्ञान सम्मिलित है। किन्तु, जैसे श्रीकृष्ण मानव-समाज के चार विभागों की इस व्यवस्था से परे, दिव्य हैं, वैसे ही कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति भी मानव-समाज के समस्त विभागों से परे, दिव्य है, चाहे हम समुदाय, राष्ट्र अथवा जाति के विभागों पर विचार करें।