हि

अध्याय 4 · 14 / 42

4.14

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥

न—कभी नहीं; माम्—मुझको; कर्माणि—समस्त प्रकार के कर्म; लिम्पन्ति—प्रभावित करते हैं; न—न ही; मे—मेरी; कर्म-फले—सकाम कर्म में; स्पृहा—आकांक्षा; इति—इस प्रकार; माम्—मुझको; यः—जो; अभिजानाति—भली-भाँति जानता है; कर्मभिः—ऐसे कर्म की प्रतिक्रिया से; न—कभी नहीं; सः—वह; बध्यते—बँधता है।

ऐसा कोई कर्म नहीं जो मुझे प्रभावित करे; न ही मुझे कर्म के फलों की अभिलाषा है। मेरे विषय में इस सत्य को जो समझ लेता है, वह भी कर्म की सकाम प्रतिक्रियाओं में नहीं बँधता।

जिस प्रकार भौतिक जगत् में ऐसे संवैधानिक नियम होते हैं कि राजा कोई अनुचित कार्य नहीं कर सकता, अथवा राजा राज्य के नियमों के अधीन नहीं होता, उसी प्रकार भगवान्, यद्यपि वे इस भौतिक जगत् के स्रष्टा हैं, भौतिक जगत् की गतिविधियों से प्रभावित नहीं होते। वे सृष्टि करते हैं और सृष्टि से पृथक् रहते हैं, जबकि जीव भौतिक संसाधनों पर प्रभुत्व जमाने की अपनी प्रवृत्ति के कारण भौतिक कर्मों के सकाम फलों में बँध जाते हैं। किसी प्रतिष्ठान का स्वामी कर्मचारियों के उचित-अनुचित कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होता, अपितु कर्मचारी स्वयं उत्तरदायी होते हैं। जीव इन्द्रियतृप्ति के अपने-अपने कार्यों में संलग्न रहते हैं, और ये कार्य भगवान् द्वारा निर्धारित नहीं किए जाते। इन्द्रियतृप्ति की वृद्धि के लिए जीव इस जगत् के कर्मों में प्रवृत्त रहते हैं, और मृत्यु के पश्चात् स्वर्गीय सुख की अभिलाषा करते हैं। भगवान्, स्वयं में पूर्ण होने के कारण, तथाकथित स्वर्गीय सुख के प्रति कोई आकर्षण नहीं रखते। स्वर्ग के देवता तो मात्र उनके नियुक्त सेवक हैं। स्वामी कभी उस निम्नकोटि के सुख की कामना नहीं करता जिसकी कामना कर्मचारी कर सकते हैं। वे भौतिक क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से पृथक् रहते हैं। उदाहरणार्थ, पृथ्वी पर उगने वाली विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के लिए वर्षा उत्तरदायी नहीं होती, यद्यपि ऐसी वर्षा के बिना वनस्पति की वृद्धि की कोई सम्भावना नहीं रहती। वैदिक स्मृति इस तथ्य की पुष्टि इस प्रकार करती है—

nimitta-mātram evāsau sṛjyānāṁ sarga-karmaṇi

pradhāna-kāraṇī-bhūtā yato vai sṛjya-śaktayaḥ.

भौतिक सृष्टियों में भगवान् केवल परम कारण हैं। तात्कालिक कारण तो भौतिक प्रकृति है, जिसके द्वारा यह विश्व-प्रकटीकरण दृष्टिगोचर होता है। सृष्ट जीव अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे देवता, मनुष्य और निम्न पशु, और वे सभी अपने पूर्वकृत शुभ अथवा अशुभ कर्मों की प्रतिक्रियाओं के अधीन रहते हैं। भगवान् केवल उन्हें ऐसे कर्मों के लिए उपयुक्त सुविधाएँ तथा प्रकृति के गुणों के विधान प्रदान करते हैं, किन्तु वे उनके पूर्व अथवा वर्तमान कर्मों के लिए कभी उत्तरदायी नहीं होते। वेदान्त-सूत्र में इसकी पुष्टि होती है कि भगवान् किसी जीव के प्रति कभी पक्षपात नहीं करते। जीव अपने ही कर्मों के लिए उत्तरदायी है। भगवान् केवल बहिरंगा शक्ति, अर्थात् भौतिक प्रकृति के माध्यम से, उसे सुविधाएँ प्रदान करते हैं। कर्म, अर्थात् सकाम कर्म के इस नियम की समस्त जटिलताओं से जो पूर्णतः परिचित है, वह अपने कर्मों के फलों से प्रभावित नहीं होता। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति भगवान् की इस दिव्य प्रकृति को समझता है, वह कृष्णभावनामृत में अनुभवी पुरुष है, और इस प्रकार वह कभी कर्म के नियमों के अधीन नहीं होता। जो भगवान् की दिव्य प्रकृति को नहीं जानता और जो यह सोचता है कि भगवान् के कार्य सकाम फलों की ओर लक्षित हैं, जैसे सामान्य जीवों के कार्य होते हैं, वह निश्चय ही स्वयं सकाम प्रतिक्रिया में बँध जाता है। किन्तु जो परम सत्य को जानता है, वह कृष्णभावनामृत में स्थित एक मुक्त आत्मा है।