अध्याय 4 · 15 / 42
4.15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
एवम्—इस प्रकार; ज्ञात्वा—भली-भाँति जानकर; कृतम्—सम्पन्न किया; कर्म—कर्म; पूर्वैः—विगत अधिकारियों द्वारा; अपि—यद्यपि; मुमुक्षुभिः—जिन्होंने मुक्ति प्राप्त की; कुरु—बस सम्पन्न करो; कर्म—विहित कर्तव्य; एव—निश्चय ही; तस्मात्—अतः; त्वम्—तुम; पूर्वैः—पूर्वजों द्वारा; पूर्वतरम्—प्राचीन पूर्वजों; कृतम्—जैसा सम्पन्न किया गया।
प्राचीन काल की समस्त मुक्त आत्माओं ने इसी समझ के साथ कर्म किया और इस प्रकार मुक्ति प्राप्त की। अतः, प्राचीनों के समान, तुम्हें इसी दिव्य चेतना में अपना कर्तव्य सम्पन्न करना चाहिए।
मनुष्यों के दो वर्ग हैं। उनमें से कुछ के हृदय में दूषित भौतिक वस्तुएँ भरी रहती हैं, और कुछ भौतिक रूप से मुक्त होते हैं। कृष्णभावनामृत इन दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों के लिए समान रूप से कल्याणकारी है। जिनमें मलिन वस्तुएँ भरी हैं, वे भक्ति के विधि-विधानों का पालन करते हुए क्रमिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया हेतु कृष्णभावनामृत के मार्ग को अपना सकते हैं। जो पहले से ही अशुद्धियों से शुद्ध हो चुके हैं, वे उसी कृष्णभावनामृत में कर्म करते रह सकते हैं, जिससे अन्य लोग उनके अनुकरणीय कार्यों का अनुसरण कर सकें और इस प्रकार लाभान्वित हों। कृष्णभावनामृत में मूर्ख व्यक्ति अथवा नवदीक्षित प्रायः कृष्णभावनामृत का ज्ञान हुए बिना ही कर्मों से निवृत्त होना चाहते हैं। युद्धभूमि में कर्मों से निवृत्त होने की अर्जुन की इच्छा को भगवान् ने अनुमोदित नहीं किया। मनुष्य को केवल यह जानने की आवश्यकता है कि कर्म कैसे किया जाए। कृष्णभावनामृत के कार्यों से निवृत्त होकर पृथक् बैठ जाना और कृष्णभावनामृत का प्रदर्शन करना श्रीकृष्ण के निमित्त कर्मक्षेत्र में वास्तविक रूप से प्रवृत्त होने की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण है। यहाँ अर्जुन को परामर्श दिया जाता है कि वह भगवान् के पूर्ववर्ती शिष्यों, जैसे सूर्यदेव विवस्वान्, के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए कृष्णभावनामृत में कर्म करे, जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है। परमेश्वर अपने समस्त विगत कर्मों को जानते हैं, साथ ही उन व्यक्तियों के कर्मों को भी जिन्होंने भूतकाल में कृष्णभावनामृत में कर्म किया। अतः वे सूर्यदेव के कर्मों की अनुशंसा करते हैं, जिन्होंने यह कला भगवान् से कुछ लाखों वर्ष पूर्व सीखी थी। भगवान् श्रीकृष्ण के ऐसे समस्त शिष्यों का उल्लेख यहाँ विगत मुक्त व्यक्तियों के रूप में हुआ है, जो श्रीकृष्ण द्वारा निर्धारित कर्तव्यों के निर्वाह में संलग्न थे।