अध्याय 4 · 16 / 42
4.16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
किम्—क्या है; कर्म—कर्म; किम्—क्या है; अकर्म—अकर्म; इति—इस प्रकार; कवयः—बुद्धिमान; अपि—भी; अत्र—इस विषय में; मोहिताः—मोहित; तत्—वह; ते—तुम्हें; कर्म—कर्म; प्रवक्ष्यामि—मैं समझाऊँगा; यत्—जिसे; ज्ञात्वा—जानकर; मोक्ष्यसे—मुक्त हो जाओगे; अशुभात्—दुर्भाग्य से।
बुद्धिमान व्यक्ति भी यह निर्धारित करने में मोहित हो जाते हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है। अब मैं तुम्हें समझाऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम समस्त पापों से मुक्त हो जाओगे।
कृष्णभावनामृत में कर्म पूर्ववर्ती प्रामाणिक भक्तों के उदाहरणों के अनुरूप सम्पन्न किया जाना चाहिए। पन्द्रहवें श्लोक में इसकी अनुशंसा की गई है। ऐसा कर्म स्वतन्त्र क्यों नहीं होना चाहिए, इसका वर्णन आगे आने वाले श्लोक में किया जाएगा।
कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए मनुष्य को उन अधिकृत व्यक्तियों के नेतृत्व का अनुसरण करना चाहिए जो गुरु-परम्परा की श्रृंखला में हैं, जैसा कि इस अध्याय के आरम्भ में समझाया गया है। कृष्णभावनामृत की प्रणाली सर्वप्रथम सूर्यदेव को बताई गई, सूर्यदेव ने इसे अपने पुत्र मनु को समझाया, मनु ने इसे अपने पुत्र इक्ष्वाकु को समझाया, और यह प्रणाली उसी अति प्राचीन काल से इस पृथ्वी पर प्रचलित है। अतः मनुष्य को गुरु-परम्परा की श्रृंखला में पूर्ववर्ती अधिकारियों के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। अन्यथा अत्यन्त बुद्धिमान मनुष्य भी कृष्णभावनामृत के मानक कर्मों के विषय में मोहित हो जाएँगे। इसी कारण भगवान् ने अर्जुन को कृष्णभावनामृत की प्रत्यक्ष शिक्षा देने का निश्चय किया। अर्जुन को भगवान् की प्रत्यक्ष शिक्षा के कारण, जो कोई अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करता है, वह निश्चय ही मोहित नहीं होता।
कहा जाता है कि मनुष्य केवल अपूर्ण प्रायोगिक ज्ञान द्वारा धर्म के मार्गों का निश्चय नहीं कर सकता। वस्तुतः धर्म के सिद्धान्त केवल भगवान् द्वारा ही निर्धारित किए जा सकते हैं। धर्मं हि साक्षात्-भगवत्-प्रणीतम्। कोई भी अपूर्ण कल्पना द्वारा धार्मिक सिद्धान्त नहीं गढ़ सकता। मनुष्य को ब्रह्मा, शिव, नारद, मनु, कुमार, कपिल, प्रह्लाद, भीष्म, श्रील शुकदेव गोस्वामी, यमराज, जनक आदि महान् अधिकारियों के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। मानसिक कल्पना द्वारा मनुष्य यह निश्चय नहीं कर सकता कि धर्म अथवा आत्म-साक्षात्कार क्या है। अतः अपने भक्तों के प्रति अहैतुकी कृपावश भगवान् अर्जुन को प्रत्यक्ष रूप से समझाते हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है। केवल कृष्णभावनामृत में सम्पन्न किया गया कर्म ही किसी व्यक्ति को भौतिक अस्तित्व के बन्धन से मुक्त कर सकता है।