हि

अध्याय 4 · 17 / 42

4.17

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥

कर्मणः—कर्म की व्यवस्था; हि—निश्चय ही; अपि—भी; बोद्धव्यम्—समझा जाना चाहिए; बोद्धव्यम्—समझा जाना चाहिए; च—भी; विकर्मणः—निषिद्ध कर्म; अकर्मणः—अकर्म; च—भी; बोद्धव्यम्—समझा जाना चाहिए; गहना—अत्यन्त कठिन; कर्मणः—कर्म की व्यवस्था; गतिः—में प्रवेश करना।

कर्म की जटिलताओं को समझना अत्यन्त कठिन है। अतः मनुष्य को भली-भाँति जानना चाहिए कि कर्म क्या है, निषिद्ध कर्म क्या है, और अकर्म क्या है।

यदि कोई भौतिक बन्धन से मुक्ति के विषय में गम्भीर है, तो उसे कर्म, अकर्म और अनधिकृत कर्मों के बीच के भेदों को समझना होगा। मनुष्य को कर्म, प्रतिक्रिया और विकृत कर्मों के ऐसे विश्लेषण में स्वयं को प्रवृत्त करना चाहिए, क्योंकि यह अत्यन्त कठिन विषय है। कृष्णभावनामृत तथा गुणों के अनुसार कर्म को समझने के लिए मनुष्य को परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को जानना होगा; अर्थात् जिसने पूर्ण रूप से सीख लिया है, वह जानता है कि प्रत्येक जीव भगवान् का नित्य सेवक है, और फलस्वरूप उसे कृष्णभावनामृत में कर्म करना होगा। सम्पूर्ण भगवद्गीता इसी निष्कर्ष की ओर निर्देशित है। इस चेतना तथा इसकी सहवर्ती प्रतिक्रियाओं के विरुद्ध कोई भी अन्य निष्कर्ष विकर्म, अर्थात् निषिद्ध कर्म हैं। इस सबको समझने के लिए मनुष्य को कृष्णभावनामृत के अधिकारियों की संगति करनी चाहिए और उनसे यह रहस्य सीखना चाहिए; यह साक्षात् भगवान् से सीखने के समान है। अन्यथा अत्यन्त बुद्धिमान व्यक्ति भी मोहित हो जाएगा।