अध्याय 4 · 18 / 42
4.18
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
कर्मणि—कर्म में; अकर्म—अकर्म; यः—जो; पश्येत्—देखता है; अकर्मणि—अकर्म में; च—भी; कर्म—सकाम कर्म; यः—जो; सः—वह; बुद्धिमान्—बुद्धिमान है; मनुष्येषु—मानव समाज में; सः—वह; युक्तः—दिव्य स्थिति में है; कृत्स्न-कर्म-कृत्—यद्यपि समस्त कार्यों में संलग्न।
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, और यद्यपि वह सब प्रकार के कार्यों में संलग्न रहता है, तथापि वह दिव्य स्थिति में है।
कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कर्म के बन्धनों से मुक्त रहता है। उसके समस्त कार्य श्रीकृष्ण के लिए सम्पन्न होते हैं; अतः वह कर्म के किसी भी प्रभाव का भोग अथवा कष्ट नहीं भोगता। फलस्वरूप वह मानव समाज में बुद्धिमान है, यद्यपि वह श्रीकृष्ण के लिए सब प्रकार के कार्यों में संलग्न रहता है। अकर्म का अर्थ है कर्म की प्रतिक्रिया से रहित। निर्विशेषवादी भय के कारण सकाम कर्मों को त्याग देता है, जिससे परिणामस्वरूप होने वाला कर्म आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधा न बने, किन्तु सविशेषवादी अपनी स्थिति को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नित्य सेवक के रूप में भली-भाँति जानता है। अतः वह स्वयं को कृष्णभावनामृत के कार्यों में संलग्न करता है। चूँकि सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए किया जाता है, इसलिए वह इस सेवा के निर्वाह में केवल दिव्य सुख का ही भोग करता है। जो इस प्रक्रिया में संलग्न हैं, वे व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित जाने जाते हैं। श्रीकृष्ण के प्रति नित्य सेवकत्व का भाव मनुष्य को कर्म के सब प्रकार के प्रतिक्रियात्मक तत्त्वों से प्रतिरक्षित कर देता है।