अध्याय 4 · 19 / 42
4.19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥
यस्य—जिसके; सर्वे—सब प्रकार के; समारम्भाः—समस्त प्रयासों में; काम—इन्द्रियतृप्ति की इच्छा; सङ्कल्प—संकल्प; वर्जिताः—रहित हैं; ज्ञान—पूर्ण ज्ञान की; अग्नि—अग्नि; दग्ध—से जला हुआ; कर्माणम्—कर्ता को; तम्—उसे; आहुः—घोषित करते हैं; पण्डितम्—विद्वान्; बुधाः—जो जानते हैं।
जिसका प्रत्येक कर्म इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित होता है, वह पूर्ण ज्ञान में स्थित समझा जाता है। मनीषीगण उसे ऐसा कर्ता कहते हैं जिसका सकाम कर्म पूर्ण ज्ञान की अग्नि में जल चुका है।
केवल पूर्ण ज्ञान में स्थित व्यक्ति ही कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के कार्यों को समझ सकता है। चूँकि कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति सब प्रकार की इन्द्रियतृप्ति-सम्बन्धी प्रवृत्तियों से रहित होता है, इसलिए यह समझा जाना चाहिए कि उसने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नित्य सेवक के रूप में अपनी स्वरूपगत स्थिति के पूर्ण ज्ञान द्वारा अपने कर्म की प्रतिक्रियाओं को भस्म कर दिया है। वही वास्तव में विद्वान् है जिसने ज्ञान की ऐसी पूर्णता प्राप्त कर ली है। भगवान् के नित्य सेवकत्व के इस ज्ञान के विकास की तुलना अग्नि से की गई है। ऐसी अग्नि, एक बार प्रज्वलित होने पर, कर्म की सब प्रकार की प्रतिक्रियाओं को भस्म कर सकती है।