हि

अध्याय 4 · 20 / 42

4.20

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥

त्यक्त्वा—त्याग कर; कर्म-फल-आसङ्गम्—सकाम फलों के प्रति आसक्ति; नित्य—सदा; तृप्तः—सन्तुष्ट होते हुए; निराश्रयः—किसी आश्रय के बिना; कर्मणि—कर्म में; अभिप्रवृत्तः—पूर्णतः संलग्न होते हुए; अपि—होने पर भी; न—नहीं; एव—निश्चय ही; किञ्चित्—कुछ भी; करोति—करता है; सः—वह।

अपने कर्मों के फलों के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग करते हुए, सदा सन्तुष्ट और स्वतन्त्र रहने वाला वह व्यक्ति, यद्यपि सब प्रकार के कार्यों में संलग्न रहता है, तथापि कोई सकाम कर्म नहीं करता।

कर्मों के बन्धन से यह मुक्ति केवल कृष्णभावनामृत में ही सम्भव है, जब मनुष्य सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति शुद्ध प्रेमवश कर्म करता है, और अतः उसे कर्म के फलों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहता। वह अपने व्यक्तिगत भरण-पोषण के प्रति भी आसक्त नहीं होता, क्योंकि सब कुछ श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया जाता है। न तो वह वस्तुएँ अर्जित करने के लिए व्यग्र रहता है, न ही पहले से अपने अधिकार में आई वस्तुओं की रक्षा के लिए। वह अपनी पूर्ण क्षमता से अपना कर्तव्य करता है और सब कुछ श्रीकृष्ण पर छोड़ देता है। ऐसा अनासक्त व्यक्ति शुभ और अशुभ की परिणामी प्रतिक्रियाओं से सदा मुक्त रहता है; मानो वह कुछ भी न कर रहा हो। यही अकर्म, अर्थात् सकाम प्रतिक्रियाओं से रहित कर्म का लक्षण है। अतः कृष्णभावनामृत से रहित कोई भी अन्य कर्म कर्ता को बाँधने वाला होता है, और यही विकर्म का वास्तविक पक्ष है, जैसा कि पूर्व में समझाया गया है।