अध्याय 4 · 21 / 42
4.21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
निराशीः—फलों की इच्छा के बिना; यत—संयमित; चित्त-आत्मा—मन और बुद्धि; त्यक्त—त्याग कर; सर्व—समस्त; परिग्रहः—समस्त सम्पत्ति पर स्वामित्व का भाव; शारीरम्—शरीर और आत्मा को एक साथ रखने में; केवलम्—केवल; कर्म—कर्म; कुर्वन्—ऐसा करते हुए; न—कभी नहीं; आप्नोति—अर्जित नहीं करता; किल्बिषम्—पाप-प्रतिक्रियाएँ।
ऐसा ज्ञानी पुरुष मन और बुद्धि को पूर्णतः संयमित रखकर कर्म करता है, अपनी सम्पत्ति पर स्वामित्व का समस्त भाव त्याग देता है, और केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए कर्म करता है। इस प्रकार कर्म करते हुए वह पाप-प्रतिक्रियाओं से प्रभावित नहीं होता।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने कार्यों में शुभ अथवा अशुभ फलों की अपेक्षा नहीं करता। उसका मन और बुद्धि पूर्णतः संयमित रहते हैं। वह जानता है कि वह परमेश्वर का अंश है, और अतः उसके द्वारा निभाई गई भूमिका, पूर्ण के अंश के रूप में, उसकी अपनी पसन्द से नहीं अपितु परमेश्वर द्वारा उसके लिए चुनी गई है और केवल उन्हीं के माध्यम से सम्पन्न होती है। जब हाथ हिलता है, तो वह अपनी इच्छा से नहीं हिलता, अपितु सम्पूर्ण शरीर के प्रयास से हिलता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदा परम इच्छा के साथ संयोजित रहता है, क्योंकि उसे व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की कोई इच्छा नहीं रहती। वह ठीक किसी यन्त्र के पुर्जे के समान गति करता है। जिस प्रकार यन्त्र के पुर्जे को अनुरक्षण हेतु तेल और सफ़ाई की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने कर्म द्वारा अपना भरण-पोषण केवल इसीलिए करता है कि वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा हेतु कार्यक्षम बना रहे। अतः वह अपने प्रयासों की समस्त प्रतिक्रियाओं से प्रतिरक्षित रहता है। पशु के समान, उसका अपने शरीर पर भी कोई स्वामित्व नहीं होता। किसी पशु का क्रूर स्वामी कभी-कभी अपने अधिकार में आए पशु का वध कर देता है, फिर भी वह पशु विरोध नहीं करता। न ही उसमें कोई वास्तविक स्वतन्त्रता होती है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, आत्म-साक्षात्कार में पूर्णतः संलग्न होने के कारण, किसी भौतिक वस्तु पर मिथ्या स्वामित्व जमाने के लिए बहुत कम समय रखता है। शरीर और आत्मा को बनाए रखने के लिए उसे धन संचित करने के अनुचित साधनों की आवश्यकता नहीं होती। अतः वह ऐसे भौतिक पापों से कलुषित नहीं होता। वह अपने कर्मों की समस्त प्रतिक्रियाओं से मुक्त रहता है।