अध्याय 4 · 22 / 42
4.22
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
यदृच्छा—स्वतः ही; लाभ—लाभ; सन्तुष्टः—सन्तुष्ट; द्वन्द्व—द्वैत; अतीतः—पार कर गया; विमत्सरः—ईर्ष्या से मुक्त; समः—स्थिर; सिद्धौ—सफलता में; असिद्धौ—असफलता में; च—भी; कृत्वा—करते हुए; अपि—यद्यपि; न—कभी नहीं; निबध्यते—प्रभावित होता है।
जो स्वतः ही प्राप्त होने वाले लाभ से सन्तुष्ट रहता है, जो द्वैत से मुक्त है और ईर्ष्या नहीं करता, जो सफलता और असफलता दोनों में स्थिर रहता है, वह कर्म करते हुए भी कभी नहीं बँधता।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने शरीर को बनाए रखने के लिए भी अधिक प्रयास नहीं करता। वह उन लाभों से सन्तुष्ट रहता है जो स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं। वह न तो माँगता है और न उधार लेता है, अपितु अपनी सामर्थ्य भर ईमानदारी से परिश्रम करता है, और अपने ही ईमानदार श्रम से जो भी प्राप्त होता है, उसी से सन्तुष्ट रहता है। अतः वह अपनी जीविका में स्वतन्त्र रहता है। वह कृष्णभावनामृत में अपनी सेवा को किसी अन्य की सेवा से बाधित नहीं होने देता। तथापि, भगवान् की सेवा के लिए वह भौतिक जगत् के द्वैत से विचलित हुए बिना किसी भी प्रकार के कर्म में भाग ले सकता है। भौतिक जगत् का द्वैत ताप और शीत, अथवा दुःख और सुख के रूप में अनुभव किया जाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति द्वैत से ऊपर है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए किसी भी प्रकार से कर्म करने में संकोच नहीं करता। अतः वह सफलता और असफलता दोनों में स्थिर रहता है। ये लक्षण तब प्रकट होते हैं जब मनुष्य पूर्णतः दिव्य ज्ञान में स्थित हो।