हि

अध्याय 4 · 23 / 42

4.23

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥

गत-सङ्गस्य—भौतिक प्रकृति के गुणों से अनासक्त; मुक्तस्य—मुक्त का; ज्ञान-अवस्थित—दिव्यता में स्थित; चेतसः—ऐसी प्रज्ञा के; यज्ञाय—यज्ञ (श्रीकृष्ण) के निमित्त; आचरतः—इस प्रकार कर्म करते हुए; कर्म—कर्म; समग्रम्—पूर्णतः; प्रविलीयते—पूर्णतः विलीन हो जाता है।

जो मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों से अनासक्त है और जो पूर्णतः दिव्य ज्ञान में स्थित है, उसका कर्म पूर्णतः दिव्यता में विलीन हो जाता है।

पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होने पर मनुष्य समस्त द्वैतों से मुक्त हो जाता है और इस प्रकार भौतिक गुणों के कल्मष से मुक्त रहता है। वह मुक्त हो सकता है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध में अपनी स्वरूपगत स्थिति को जानता है; और इस प्रकार उसका मन कृष्णभावनामृत से नहीं हटाया जा सकता। फलस्वरूप, वह जो कुछ भी करता है, श्रीकृष्ण के लिए करता है, जो आदि विष्णु हैं। अतः उसके समस्त कर्म तकनीकी रूप से यज्ञ हैं, क्योंकि यज्ञ में परम पुरुष श्रीकृष्ण की तुष्टि निहित होती है। ऐसे समस्त कर्म की परिणामी प्रतिक्रियाएँ निश्चय ही दिव्यता में विलीन हो जाती हैं, और मनुष्य भौतिक प्रभावों को नहीं भोगता।