अध्याय 4 · 24 / 42
4.24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
ब्रह्म—आध्यात्मिक प्रकृति; अर्पणम्—अर्पण; ब्रह्म—परम; हविः—घृत; ब्रह्म—आध्यात्मिक; अग्नौ—पूर्णता की अग्नि में; ब्राह्मणा—आत्मा द्वारा; हुतम्—अर्पित; ब्रह्म—आध्यात्मिक राज्य; एव—निश्चय ही; तेन—उसके द्वारा; गन्तव्यम्—प्राप्त किया जाने वाला; ब्रह्म—आध्यात्मिक; कर्म—कार्य; समाधिना—पूर्ण तल्लीनता द्वारा।
जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में पूर्णतः तल्लीन है, वह आध्यात्मिक राज्य को निश्चय ही प्राप्त करता है, क्योंकि वह आध्यात्मिक कार्यों में अपना पूर्ण योगदान देता है, जिनमें पूर्णता परम है और जो अर्पित किया जाता है वह भी उसी आध्यात्मिक प्रकृति का है।
कृष्णभावनामृत में किए गए कार्य किस प्रकार मनुष्य को अन्ततः आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर ले जा सकते हैं, इसका वर्णन यहाँ किया गया है। कृष्णभावनामृत में विविध कार्य हैं, और उन सबका वर्णन आगे आने वाले श्लोकों में किया जाएगा। किन्तु, वर्तमान में, केवल कृष्णभावनामृत का सिद्धान्त ही वर्णित है। भौतिक कल्मष में बँधा हुआ बद्ध जीव निश्चय ही भौतिक वातावरण में कर्म करता है, और फिर भी उसे ऐसे वातावरण से बाहर निकलना होता है। जिस प्रक्रिया से बद्ध जीव भौतिक वातावरण से बाहर निकल सकता है, वह कृष्णभावनामृत है। उदाहरणार्थ, जो रोगी दुग्ध-उत्पादों के अति-सेवन के कारण उदर-विकार से पीड़ित है, वह एक अन्य दुग्ध-उत्पाद, अर्थात् दही से स्वस्थ हो जाता है। भौतिकता में तल्लीन बद्ध जीव कृष्णभावनामृत द्वारा स्वस्थ किया जा सकता है, जैसा कि यहाँ गीता में प्रतिपादित है। यह प्रक्रिया सामान्यतः यज्ञ, अर्थात् केवल विष्णु अथवा श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए अभिप्रेत कार्यों (यज्ञों) के रूप में जानी जाती है। भौतिक जगत् के कार्य जितने अधिक कृष्णभावनामृत में, अथवा केवल विष्णु के लिए, सम्पन्न किए जाते हैं, उतना ही वातावरण पूर्ण तल्लीनता द्वारा आध्यात्मिक होता जाता है। ब्रह्म का अर्थ है आध्यात्मिक। भगवान् आध्यात्मिक हैं, और उनके दिव्य शरीर की किरणें ब्रह्मज्योति, अर्थात् उनकी आध्यात्मिक प्रभा कहलाती हैं। जो कुछ भी विद्यमान है, वह उसी ब्रह्मज्योति में स्थित है, किन्तु जब वह ज्योति माया अथवा इन्द्रियतृप्ति से आच्छादित होती है, तब उसे भौतिक कहा जाता है। यह भौतिक आवरण कृष्णभावनामृत द्वारा तत्काल हटाया जा सकता है; इस प्रकार कृष्णभावनामृत के निमित्त अर्पण, ऐसे अर्पण अथवा योगदान का उपभोक्ता तत्त्व, उपभोग की प्रक्रिया, योगदानकर्ता और फल—ये सब मिलकर ब्रह्म, अर्थात् परम सत्य हैं। माया से आच्छादित परम सत्य पदार्थ कहलाता है। परम सत्य के प्रयोजन हेतु संयोजित पदार्थ अपना आध्यात्मिक गुण पुनः प्राप्त कर लेता है। कृष्णभावनामृत भ्रामक चेतना को ब्रह्म, अर्थात् परम में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। जब मन पूर्णतः कृष्णभावनामृत में तल्लीन हो जाता है, तब वह समाधि, अर्थात् ध्यानावस्था में कहा जाता है। ऐसी दिव्य चेतना में किया गया कोई भी कार्य यज्ञ, अर्थात् परम के निमित्त यज्ञ कहलाता है। आध्यात्मिक चेतना की उस अवस्था में, योगदानकर्ता, योगदान, उपभोग, अनुष्ठान का कर्ता अथवा नेता, और फल अथवा अन्तिम लाभ—सब कुछ—परम, परब्रह्म में एक हो जाता है। यही कृष्णभावनामृत की विधि है।