अध्याय 4 · 30 / 42
4.30
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥ ३० ॥
sarve—सभी; api—यद्यपि बाह्यतः भिन्न प्रतीत होते हैं; ete—ये सब; yajña-vidaḥ—यज्ञ-सम्पादन के प्रयोजन के ज्ञाता; yajña—यज्ञ; kṣapita—इन सम्पादनों के फल से शुद्ध; kalmaṣāḥ—पापमय प्रतिक्रियाएँ; yajña-śiṣṭa—ऐसे यज्ञ-सम्पादनों के फलस्वरूप; amṛta-bhujaḥ—जिन्होंने ऐसे अमृत का आस्वादन किया है; yānti—पहुँचते हैं; brahma—परम; sanātanam—नित्य वातावरण में।
यज्ञ के अर्थ को जानने वाले ये सभी सम्पादनकर्ता पापमय प्रतिक्रिया से शुद्ध हो जाते हैं, और ऐसे यज्ञ के अवशेषों के अमृत का आस्वादन करके वे परम नित्य वातावरण में पहुँचते हैं।
विभिन्न प्रकार के यज्ञों की पूर्वोक्त व्याख्या से (अर्थात् अपनी सम्पत्ति का यज्ञ, वेदों अथवा दार्शनिक सिद्धान्तों का अध्ययन, तथा योग-पद्धति का सम्पादन) यह ज्ञात होता है कि इन सबका सामान्य लक्ष्य इन्द्रियों का निग्रह है। इन्द्रियतृप्ति ही भौतिक अस्तित्व का मूल कारण है; अतः जब तक मनुष्य इन्द्रियतृप्ति से पृथक् किसी स्तर पर स्थित नहीं होता, तब तक पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनन्द एवं पूर्ण जीवन के नित्य स्तर तक उठने की कोई सम्भावना नहीं रहती। यह स्तर नित्य वातावरण में, अथवा ब्रह्म-वातावरण में, स्थित है। उपर्युक्त समस्त यज्ञ मनुष्य को भौतिक अस्तित्व की पापमय प्रतिक्रियाओं से शुद्ध होने में सहायता करते हैं। जीवन में इस उन्नति से मनुष्य इस जीवन में न केवल सुखी एवं ऐश्वर्यशाली बनता है, अपितु अन्त में वह ईश्वर के नित्य राज्य में भी प्रवेश करता है—या तो निराकार ब्रह्म में लीन होकर, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की संगति प्राप्त करके।