अध्याय 4 · 31 / 42
4.31
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
na—कभी नहीं; ayam—यह; lokaḥ—लोक; asti—है; ayajñasya—मूर्ख का; kutaḥ—कहाँ है; anyaḥ—अन्य; kuru-sattama—हे कुरुश्रेष्ठ।
हे कुरुवंशश्रेष्ठ! यज्ञ के बिना मनुष्य इस लोक में अथवा इस जीवन में कभी सुखपूर्वक नहीं रह सकता; तब फिर अगले जीवन का तो कहना ही क्या?
मनुष्य भौतिक अस्तित्व के जिस भी रूप में हो, वह अपनी वास्तविक स्थिति से सदैव अनभिज्ञ रहता है। दूसरे शब्दों में, भौतिक जगत् में अस्तित्व हमारे पापमय जीवनों की अनेकविध प्रतिक्रियाओं के कारण है। अज्ञान पापमय जीवन का कारण है, और पापमय जीवन भौतिक अस्तित्व में मनुष्य के घिसटते रहने का कारण है। मनुष्य-जीवन ही एकमात्र वह छिद्र है जिससे मनुष्य इस उलझन से बाहर निकल सकता है। अतः वेद धर्म, आर्थिक सुख, नियमित इन्द्रियतृप्ति, और अन्ततः इस दुःखमय अवस्था से पूर्णतया बाहर निकलने के उपायों का मार्ग दर्शाकर हमें मुक्ति का अवसर प्रदान करते हैं। धर्म का मार्ग, अथवा ऊपर अनुशंसित विभिन्न प्रकार के यज्ञ, स्वतः हमारी आर्थिक समस्याओं का समाधान कर देते हैं। यज्ञ के सम्पादन से हम पर्याप्त अन्न, पर्याप्त दूध आदि प्राप्त कर सकते हैं—भले ही तथाकथित जनसंख्या-वृद्धि क्यों न हो। जब शरीर पूर्णतया पुष्ट हो जाता है, तब स्वभावतः अगला चरण इन्द्रियों को तृप्त करना होता है। अतः वेद नियमित इन्द्रियतृप्ति हेतु पवित्र विवाह का विधान करते हैं। इससे मनुष्य क्रमशः भौतिक बन्धन से मुक्ति के स्तर तक उठता है, और मुक्त जीवन की सर्वोच्च सिद्धि परमेश्वर की संगति प्राप्त करना है। सिद्धि यज्ञ के सम्पादन से प्राप्त होती है, जैसा कि ऊपर वर्णित है। अब, यदि कोई व्यक्ति वेदों के अनुसार यज्ञ करने को उन्मुख नहीं है, तो वह सुखी जीवन की आशा कैसे कर सकता है? विभिन्न स्वर्गलोकों में भौतिक सुख के विभिन्न स्तर हैं, और सभी अवस्थाओं में विभिन्न प्रकार के यज्ञों में संलग्न व्यक्तियों के लिए अपार सुख है। किन्तु मनुष्य जो सर्वोच्च सुख प्राप्त कर सकता है, वह है कृष्णभावनामृत के अभ्यास द्वारा आध्यात्मिक लोकों में उन्नति। अतएव कृष्णभावनामृतमय जीवन ही भौतिक अस्तित्व की समस्त समस्याओं का समाधान है।