अध्याय 4 · 32 / 42
4.32
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
evam—इस प्रकार; bahu-vidhāḥ—विभिन्न प्रकार के; yajñāḥ—यज्ञ; vitatāḥ—व्यापक; brahmaṇaḥ—वेदों के; mukhe—मुख में; karma-jān—कर्म से उत्पन्न; viddhi—तुम्हें जानना चाहिए; tān—उन्हें; sarvān—सभी; evam—इस प्रकार; jñātvā—जानकर; vimokṣyase—मुक्त हो जाओगे।
ये सभी विभिन्न प्रकार के यज्ञ वेदों द्वारा अनुमोदित हैं, और इन सबकी उत्पत्ति विभिन्न प्रकार के कर्मों से होती है। इन्हें इस रूप में जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।
विभिन्न प्रकार के यज्ञ, जैसा कि ऊपर विवेचित है, वेदों में विभिन्न प्रकार के कर्ताओं के अनुकूल वर्णित हैं। चूँकि मनुष्य देहात्म-बुद्धि में इतने गहराई से डूबे हुए हैं, अतः इन यज्ञों की व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि मनुष्य या तो शरीर से, अथवा मन से, अथवा बुद्धि से कर्म कर सके। किन्तु इन सबकी अनुशंसा अन्ततः शरीर से मुक्ति प्रदान करने हेतु ही की गई है। भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से इसकी यहाँ पुष्टि करते हैं।