हि

अध्याय 4 · 34 / 42

4.34

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥

tat—विभिन्न यज्ञों का वह ज्ञान; viddhi—समझने का प्रयत्न करो; praṇipātena—आध्यात्मिक गुरु के समीप जाकर; paripraśnena—विनम्र जिज्ञासाओं द्वारा; sevayā—सेवा अर्पित करके; upadekṣyanti—दीक्षा देते हैं; te—तुम्हें; jñānam—ज्ञान; jñāninaḥ—आत्म-साक्षात्कारी; tattva—सत्य के; darśinaḥ—द्रष्टा।

किसी आध्यात्मिक गुरु के समीप जाकर सत्य को जानने का प्रयत्न करो। उनसे विनम्रतापूर्वक जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकता है, क्योंकि उसने सत्य का दर्शन किया है।

आध्यात्मिक साक्षात्कार का मार्ग निःसन्देह कठिन है। अतः भगवान् हमें परामर्श देते हैं कि हम स्वयं भगवान् से चली आ रही गुरु-परम्परा में स्थित किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाएँ। गुरु-परम्परा के इस सिद्धान्त का पालन किए बिना कोई प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता। भगवान् आदि आध्यात्मिक गुरु हैं, और गुरु-परम्परा में स्थित व्यक्ति भगवान् के सन्देश को ज्यों-का-त्यों अपने शिष्य तक पहुँचा सकता है। जैसा कि मूर्ख ढोंगियों की रीति है, अपनी ही पद्धति गढ़कर कोई आध्यात्मिक रूप से साक्षात्कारी नहीं हो सकता। भागवत कहता है: धर्मं हि साक्षाद्-भगवत्-प्रणीतम्—धर्म का मार्ग साक्षात् भगवान् द्वारा घोषित है। अतएव मानसिक कल्पना अथवा शुष्क तर्क मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने में सहायता नहीं कर सकते। ज्ञान प्राप्त करने हेतु मनुष्य को किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना ही होता है। ऐसे आध्यात्मिक गुरु को पूर्ण शरणागति के साथ स्वीकार करना चाहिए, और मनुष्य को मिथ्या प्रतिष्ठा त्यागकर एक तुच्छ सेवक की भाँति आध्यात्मिक गुरु की सेवा करनी चाहिए। आत्म-साक्षात्कारी आध्यात्मिक गुरु की प्रसन्नता ही आध्यात्मिक जीवन में उन्नति का रहस्य है। जिज्ञासा एवं विनम्रता मिलकर आध्यात्मिक बोध हेतु उचित संयोग बनाती हैं। जब तक विनम्रता एवं सेवा न हो, तब तक विद्वान् आध्यात्मिक गुरु से की गई जिज्ञासाएँ प्रभावकारी नहीं होंगी। मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु की परीक्षा में उत्तीर्ण होने में समर्थ होना चाहिए, और जब वे शिष्य की सच्ची अभिलाषा को देखते हैं, तब वे स्वतः शिष्य को सच्चे आध्यात्मिक बोध का आशीर्वाद देते हैं। इस श्लोक में अन्धानुकरण तथा निरर्थक जिज्ञासाएँ—दोनों की निन्दा की गई है। मनुष्य को न केवल आध्यात्मिक गुरु से विनम्रतापूर्वक श्रवण करना चाहिए, अपितु विनम्रता, सेवा एवं जिज्ञासाओं के साथ उनसे स्पष्ट बोध भी प्राप्त करना चाहिए। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु स्वभाव से ही शिष्य पर अत्यन्त कृपालु होते हैं। अतः जब शिष्य विनम्र होता है और सदैव सेवा अर्पित करने को तत्पर रहता है, तब ज्ञान एवं जिज्ञासाओं का आदान-प्रदान पूर्ण हो जाता है।