हि

अध्याय 4 · 35 / 42

4.35

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषाणि द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥

yat—जिसे; jñātvā—जानकर; na—कभी नहीं; punaḥ—पुनः; moham—मोह; evam—इस प्रकार; yāsyasi—तुम जाओगे; pāṇḍava—हे पाण्डुपुत्र; yena—जिससे; bhūtāni—समस्त जीव; aśeṣāṇi—सम्पूर्णतः; drakṣyasi—तुम देखोगे; ātmani—परमात्मा में; atho—अथवा दूसरे शब्दों में; mayi—मुझमें।

और जब तुम इस प्रकार सत्य को जान लोगे, तब तुम जानोगे कि समस्त जीव मेरे ही अंश हैं—और वे मुझमें हैं, तथा मेरे हैं।

किसी आत्म-साक्षात्कारी आत्मा से, अथवा वस्तुओं को यथारूप में जानने वाले से, ज्ञान प्राप्त करने का फल यह जानना है कि समस्त जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के अंश हैं। श्रीकृष्ण से पृथक् अस्तित्व का भाव माया कहलाता है (मा—नहीं, या—यह)। कुछ लोग सोचते हैं कि हमारा श्रीकृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं, कि श्रीकृष्ण केवल एक महान् ऐतिहासिक पुरुष हैं और परम सत्य निराकार ब्रह्म है। वस्तुतः, जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, यह निराकार ब्रह्म श्रीकृष्ण का ही दिव्य तेज है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में श्रीकृष्ण ही समस्त वस्तुओं के कारण हैं। ब्रह्म-संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, समस्त कारणों के कारण हैं। यहाँ तक कि उनके लाखों अवतार भी उनके ही विभिन्न विस्तार हैं। इसी प्रकार, जीव भी श्रीकृष्ण के ही विस्तार हैं। मायावादी दार्शनिक भ्रमवश सोचते हैं कि श्रीकृष्ण अपने अनेक विस्तारों में अपने पृथक् अस्तित्व को खो देते हैं। यह विचार प्रकृति से भौतिक है। हमें भौतिक जगत् में यह अनुभव है कि कोई वस्तु जब खण्डशः वितरित की जाती है, तब वह अपनी मूल पहचान खो देती है। किन्तु मायावादी दार्शनिक यह समझने में असमर्थ रहते हैं कि परम सत्य का अर्थ है कि एक और एक मिलकर एक ही के बराबर हैं, तथा एक में से एक घटाने पर भी एक ही शेष रहता है। परम जगत् में यही स्थिति है।

परम विज्ञान में पर्याप्त ज्ञान के अभाव के कारण हम इस समय मोह से आच्छादित हैं, और इसीलिए हम सोचते हैं कि हम श्रीकृष्ण से पृथक् हैं। यद्यपि हम श्रीकृष्ण के पृथक् अंश हैं, तथापि हम उनसे भिन्न नहीं हैं। जीवों का देहगत भेद माया है, अर्थात् वास्तविक तथ्य नहीं है। हम सब श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु बने हैं। केवल माया के कारण ही अर्जुन ने सोचा कि अपने सम्बन्धियों के साथ क्षणिक देहगत सम्बन्ध श्रीकृष्ण के साथ उसके नित्य आध्यात्मिक सम्बन्ध से अधिक महत्त्वपूर्ण है। गीता की समूची शिक्षा इसी लक्ष्य की ओर लक्षित है: कि जीव, भगवान् के नित्य सेवक के रूप में, श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं हो सकता, और श्रीकृष्ण से पृथक् एक स्वतन्त्र पहचान होने का उसका भाव माया कहलाता है। परम के पृथक् अंश के रूप में जीवों का एक प्रयोजन पूर्ण करना है। उस प्रयोजन को भूल जाने के कारण, अनादि काल से वे मनुष्य, पशु, देवता आदि के रूप में विभिन्न शरीरों में स्थित हैं। ऐसे देहगत भेद भगवान् की दिव्य सेवा के विस्मरण से उत्पन्न होते हैं। किन्तु जब मनुष्य कृष्णभावनामृत के माध्यम से दिव्य सेवा में संलग्न होता है, तब वह तत्काल इस मोह से मुक्त हो जाता है। मनुष्य ऐसा शुद्ध ज्ञान केवल प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से ही प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार इस भ्रम से बच सकता है कि जीव श्रीकृष्ण के समान है। पूर्ण ज्ञान यह है कि परमात्मा श्रीकृष्ण समस्त जीवों के परम आश्रय हैं, और ऐसे आश्रय का त्याग करके जीव भौतिक शक्ति द्वारा भ्रमित होकर स्वयं को एक पृथक् पहचान वाला मान बैठते हैं। इस प्रकार, भौतिक पहचान के विभिन्न मानदण्डों के अधीन वे श्रीकृष्ण को विस्मृत कर देते हैं। किन्तु जब ऐसे भ्रमित जीव कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाते हैं, तब यह समझना चाहिए कि वे मुक्ति के मार्ग पर हैं, जैसा कि भागवत में पुष्टि की गई है: मुक्तिर्हित्वान्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः। मुक्ति का अर्थ है श्रीकृष्ण के नित्य सेवक (कृष्णभावनामृत) के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थित होना।