हि

अध्याय 4 · 36 / 42

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अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥

api—भी; cet—यदि; asi—तुम हो; pāpebhyaḥ—पापियों में; sarvebhyaḥ—समस्त; pāpa-kṛt-tamaḥ—सबसे बड़ा पापी; sarvam—ऐसे समस्त पापमय कर्म; jñāna-plavena—दिव्य ज्ञान की नौका से; eva—निश्चय ही; vṛjinam—दुःखों के सागर को; santariṣyasi—तुम पूर्णतया पार कर जाओगे।

यदि तुम्हें समस्त पापियों में सबसे बड़ा पापी भी माना जाए, तो भी जब तुम दिव्य ज्ञान की नौका में स्थित होगे, तब तुम दुःखों के सागर को पार करने में समर्थ हो जाओगे।

श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति का उचित बोध इतना सुन्दर है कि वह मनुष्य को अस्तित्व के उस संघर्ष से तत्काल ऊपर उठा सकता है जो अज्ञान के सागर में चलता रहता है। इस भौतिक जगत् को कभी अज्ञान का सागर और कभी प्रज्वलित वन माना जाता है। सागर में, मनुष्य चाहे कितना ही निपुण तैराक क्यों न हो, अस्तित्व का संघर्ष अत्यन्त भीषण है। यदि कोई आगे आकर संघर्षरत तैराक को सागर से ऊपर उठा ले, तो वही सबसे बड़ा रक्षक है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से प्राप्त पूर्ण ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है। कृष्णभावनामृत की नौका अत्यन्त सरल है, किन्तु साथ ही सर्वाधिक उदात्त है।