हि

अध्याय 4 · 37 / 42

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यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥

yathā—जिस प्रकार; edhāṁsi—ईंधन; samiddhaḥ—प्रज्वलित; agniḥ—अग्नि; bhasma-sāt—भस्म में परिणत कर देती है; kurute—करती है; arjuna—हे अर्जुन; jñāna-agniḥ—ज्ञान की अग्नि; sarva-karmāṇi—भौतिक क्रियाओं की समस्त प्रतिक्रियाओं को; bhasma-sāt—भस्म में; kurute—वैसा ही करती है; tathā—उसी प्रकार।

हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म में परिणत कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि भौतिक क्रियाओं की समस्त प्रतिक्रियाओं को भस्म में परिणत कर देती है।

आत्मा एवं परमात्मा तथा उनके पारस्परिक सम्बन्ध के पूर्ण ज्ञान की तुलना यहाँ अग्नि से की गई है। यह अग्नि न केवल अपवित्र क्रियाओं की समस्त प्रतिक्रियाओं को, अपितु पवित्र क्रियाओं की समस्त प्रतिक्रियाओं को भी जलाकर भस्म कर देती है। प्रतिक्रिया के अनेक स्तर हैं: निर्माणाधीन प्रतिक्रिया, फलित होती प्रतिक्रिया, पहले से ही प्राप्त प्रतिक्रिया, और भावी प्रतिक्रिया। किन्तु जीव की स्वाभाविक स्थिति का ज्ञान समस्त वस्तुओं को जलाकर भस्म कर देता है। जब मनुष्य पूर्ण ज्ञान में स्थित होता है, तब समस्त प्रतिक्रियाएँ—भूत एवं भावी दोनों—भस्म हो जाती हैं। वेदों में कहा गया है: उभे उहैवैष एते तरत्यमृतः साध्व्-असाधूनी: “मनुष्य कर्म की पवित्र एवं अपवित्र दोनों प्रतिक्रियाओं पर विजय पा लेता है।”