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अध्याय 4 · 38 / 42

4.38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥

na—कभी नहीं; hi—निश्चय ही; jñānena—ज्ञान की; sadṛśam—तुलना में; pavitram—पवित्र; iha—इस जगत् में; vidyate—विद्यमान है; tat—वह; svayam—स्वयं; yoga—भक्ति; saṁsiddhaḥ—परिपक्व; kālena—कालक्रम में; ātmani—स्वयं में; vindati—भोगता है।

इस जगत् में दिव्य ज्ञान के समान उदात्त एवं पवित्र कुछ भी नहीं है। ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक्व फल है। और जिसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह कालक्रम में स्वयं अपने भीतर आत्मा का आनन्द भोगता है।

जब हम दिव्य ज्ञान की बात करते हैं, तब हम इसे आध्यात्मिक बोध के रूप में करते हैं। इस प्रकार, दिव्य ज्ञान के समान उदात्त एवं पवित्र कुछ भी नहीं है। अज्ञान हमारे बन्धन का कारण है, और ज्ञान हमारी मुक्ति का कारण है। यह ज्ञान भक्ति का परिपक्व फल है, और जब मनुष्य दिव्य ज्ञान में स्थित होता है, तब उसे शान्ति की खोज अन्यत्र नहीं करनी पड़ती, क्योंकि वह स्वयं अपने भीतर शान्ति का अनुभव करता है। दूसरे शब्दों में, यह ज्ञान एवं शान्ति कृष्णभावनामृत में परिणत होते हैं। भगवद्गीता में यही अन्तिम वचन है।