अध्याय 4 · 7 / 42
4.7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
यदा—जब-जब; यदा—जहाँ-जहाँ; हि—निश्चय ही; धर्मस्य—धर्म की; ग्लानिः—विकृति; भवति—प्रकट होती है, होती है; भारत—हे भरतवंशी; अभ्युत्थानम्—प्रबलता; अधर्मस्य—अधर्म की; तदा—उस समय; आत्मानम्—स्वयं को; सृजामि—प्रकट करता हूँ; अहम्—मैं।
हे भरतवंशी, जब-जब और जहाँ-जहाँ धार्मिक आचरण में ह्रास होता है और अधर्म की प्रबलता बढ़ती है—उस समय मैं स्वयं को अवतरित करता हूँ।
यहाँ सृजामि शब्द सार्थक है। सृजामि का प्रयोग सृष्टि के अर्थ में नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्ववर्ती श्लोक के अनुसार भगवान् के रूप अथवा शरीर की कोई सृष्टि नहीं होती, चूँकि समस्त रूप नित्य विद्यमान हैं। अतः सृजामि का अर्थ है कि भगवान् स्वयं को जैसे हैं वैसे ही प्रकट करते हैं। यद्यपि भगवान् निश्चित समय पर प्रकट होते हैं, अर्थात् ब्रह्मा के एक दिन में आठवें मनु के अट्ठाईसवें युग के द्वापरयुग के अन्त में, फिर भी उनका ऐसे नियमों एवं विधानों का पालन करने का कोई दायित्व नहीं है, क्योंकि वे अपनी इच्छानुसार अनेक प्रकार से कार्य करने के लिए पूर्णतः स्वतन्त्र हैं। अतः वे अपनी ही इच्छा से तब प्रकट होते हैं जब-जब अधर्म की प्रबलता तथा यथार्थ धर्म का लोप होता है। धर्म के सिद्धान्त वेदों में निर्धारित हैं, और वेदों के नियमों के समुचित पालन में कोई भी विकृति मनुष्य को अधार्मिक बना देती है। भागवत में कहा गया है कि ऐसे सिद्धान्त भगवान् के विधान हैं। केवल भगवान् ही धर्म की कोई पद्धति का निर्माण कर सकते हैं। वेदों को भी मूलतः भगवान् द्वारा स्वयं ब्रह्मा को, उनके हृदय के भीतर से कहा गया स्वीकार किया जाता है। अतः धर्म के सिद्धान्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रत्यक्ष आदेश हैं (dharmaṁ tu sākṣāt-bhagavat-praṇītam)। ये सिद्धान्त सम्पूर्ण भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से इंगित किए गए हैं। वेदों का प्रयोजन परमेश्वर के आदेश के अधीन ऐसे सिद्धान्तों को स्थापित करना है, और भगवान् गीता के अन्त में प्रत्यक्ष आदेश देते हैं कि धर्म का सर्वोच्च सिद्धान्त केवल उन्हीं की शरण लेना है, और कुछ नहीं। वैदिक सिद्धान्त मनुष्य को उनकी पूर्ण शरणागति की ओर प्रेरित करते हैं; और जब-जब ऐसे सिद्धान्त असुरों द्वारा विक्षुब्ध होते हैं, तब भगवान् प्रकट होते हैं। भागवत से हम समझते हैं कि भगवान् बुद्ध श्रीकृष्ण के अवतार हैं, जो तब प्रकट हुए जब भौतिकवाद चरम पर था और भौतिकवादी वेदों के प्रामाण्य का बहाना बना रहे थे। यद्यपि वेदों में विशेष प्रयोजनों हेतु पशुबलि के विषय में कुछ निषेधात्मक नियम एवं विधान हैं, फिर भी असुर-प्रवृत्ति के लोग वैदिक सिद्धान्तों के सन्दर्भ के बिना पशुबलि करने लगे। भगवान् बुद्ध इस मूर्खता को रोकने तथा अहिंसा के वैदिक सिद्धान्त को स्थापित करने हेतु प्रकट हुए। अतः प्रत्येक अवतार, अर्थात् भगवान् के अवतरण का एक विशेष उद्देश्य होता है, और वे सभी प्रकट शास्त्रों में वर्णित हैं। किसी को भी अवतार के रूप में तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक शास्त्रों में उसका उल्लेख न हो। यह तथ्य नहीं है कि भगवान् केवल भारत-भूमि पर ही प्रकट होते हैं। वे कहीं भी और सर्वत्र, तथा जब भी प्रकट होने की इच्छा करें, स्वयं को अवतरित कर सकते हैं। प्रत्येक अवतार में वे धर्म के विषय में उतना ही बोलते हैं जितना विशेष परिस्थितियों के अधीन विशेष जन समझ सकते हैं। किन्तु उद्देश्य वही रहता है—लोगों को ईश्वर-भावना तथा धर्म के सिद्धान्तों के पालन की ओर ले जाना। कभी वे साक्षात् अवतरित होते हैं, और कभी वे अपने प्रामाणिक प्रतिनिधि को अपने पुत्र, अथवा सेवक के रूप में, अथवा स्वयं को किसी प्रच्छन्न रूप में भेजते हैं।
भगवद्गीता के सिद्धान्त अर्जुन से कहे गए, और इसी हेतु अन्य उच्च-उन्नत व्यक्तियों से भी, क्योंकि वह संसार के अन्य भागों के सामान्य व्यक्तियों की तुलना में अत्यधिक उन्नत था। दो और दो चार होते हैं—यह एक गणितीय सिद्धान्त है जो प्रारम्भिक अंकगणित की कक्षा में भी सत्य है और उन्नत कक्षा में भी। फिर भी उच्च तथा निम्न गणित होते हैं। अतः भगवान् के समस्त अवतारों में वही सिद्धान्त सिखाए जाते हैं, किन्तु विविध परिस्थितियों में वे उच्च तथा निम्न प्रतीत होते हैं। धर्म के उच्चतर सिद्धान्त चार वर्णों तथा सामाजिक जीवन की चार आश्रम-अवस्थाओं की स्वीकृति से आरम्भ होते हैं, जैसा कि आगे समझाया जाएगा। अवतारों के मिशन का समूचा प्रयोजन सर्वत्र कृष्णभावनामृत को जागृत करना है। ऐसी भावना भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अधीन ही व्यक्त तथा अव्यक्त रहती है।