अध्याय 4 · 8 / 42
4.8
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थानार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥
परित्राणाय—उद्धार हेतु; साधूनाम्—भक्तों के; विनाशाय—संहार हेतु; च—भी; दुष्कृताम्—दुष्टों के; धर्म—धर्म के सिद्धान्त; संस्थापन-अर्थाय—पुनः स्थापित करने हेतु; सम्भवामि—मैं प्रकट होता हूँ; युगे—युग; युगे—युग के पश्चात्।
धर्मात्माओं के उद्धार हेतु तथा दुष्टों के संहार हेतु, और साथ ही धर्म के सिद्धान्तों को पुनः स्थापित करने हेतु, मैं युग-युग में स्वयं को अवतरित करता हूँ।
भगवद्गीता के अनुसार, साधु (पवित्र पुरुष) वह मनुष्य है जो कृष्णभावनामृत में स्थित है। कोई व्यक्ति अधार्मिक प्रतीत हो सकता है, किन्तु यदि उसमें पूर्ण रूप से कृष्णभावनामृत की योग्यताएँ हों, तो उसे साधु समझना चाहिए। और दुष्कृताम् उस पर लागू होता है जो कृष्णभावनामृत की परवाह नहीं करता। ऐसे दुष्ट, अर्थात् दुष्कृताम्, मूर्ख तथा मानवों में अधम के रूप में वर्णित किए जाते हैं, भले ही वे सांसारिक शिक्षा से विभूषित क्यों न हों; जबकि दूसरा व्यक्ति, जो शत-प्रतिशत कृष्णभावनामृत में संलग्न है, साधु के रूप में स्वीकृत है, भले ही ऐसा व्यक्ति न तो विद्वान् हो और न ही सुसंस्कृत। जहाँ तक नास्तिकों का सम्बन्ध है, उनका संहार करने हेतु परमेश्वर का यथारूप में प्रकट होना आवश्यक नहीं, जैसा कि उन्होंने रावण तथा कंस नामक असुरों के साथ किया। भगवान् के अनेक प्रतिनिधि हैं जो असुरों का पराभव करने में पूर्णतः समर्थ हैं। किन्तु भगवान् विशेष रूप से अपने अनन्य भक्तों को सन्तुष्ट करने हेतु अवतरित होते हैं, जो सदा असुरों द्वारा प्रताड़ित होते हैं। असुर भक्त को प्रताड़ित करता है, भले ही वह उसका सम्बन्धी ही क्यों न हो। यद्यपि प्रह्लाद महाराज हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, फिर भी अपने पिता द्वारा उन्हें सताया गया; यद्यपि श्रीकृष्ण की माता देवकी कंस की बहन थीं, फिर भी उन्हें तथा उनके पति वसुदेव को केवल इसलिए सताया गया क्योंकि उनसे श्रीकृष्ण का जन्म होने वाला था। अतः भगवान् श्रीकृष्ण मुख्यतः देवकी का उद्धार करने हेतु प्रकट हुए, न कि कंस का वध करने हेतु, किन्तु दोनों कार्य एक साथ सम्पन्न हुए। अतः यहाँ कहा गया है कि भक्त का उद्धार करने तथा दुष्ट असुर का पराभव करने हेतु भगवान् भिन्न-भिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं।
कृष्णदास कविराज के चैतन्य-चरितामृत में निम्नलिखित श्लोक अवतार के इन सिद्धान्तों का सार प्रस्तुत करते हैं :
sṛṣṭi-hetu yei mūrti prapañce avatare
sei īśvara-mūrti ‘avatāra’ nāma dhare
māyātita paravyome savāra avasthāna
viśve ‘avatāri’ dhare ‘avatāra’ nāma.
“अवतार, अर्थात् भगवान् का अवतरण, भौतिक प्रकटीकरण हेतु भगवद्धाम से उतरता है। और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का जो विशेष रूप इस प्रकार उतरता है, वह अवतार कहलाता है। ऐसे अवतार आध्यात्मिक जगत्, अर्थात् भगवद्धाम में स्थित रहते हैं। जब वे भौतिक सृष्टि में उतरते हैं, तब वे अवतार नाम धारण करते हैं।”
अवतारों के विविध प्रकार हैं, जैसे पुरुषावतार, गुणावतार, लीलावतार, शक्त्यावेश अवतार, मन्वन्तर-अवतार तथा युगावतार—ये सभी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में निश्चित समय पर प्रकट होते हैं। किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं, समस्त अवतारों के उद्गम हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उन शुद्ध भक्तों की व्यथाओं को शान्त करने के विशिष्ट प्रयोजनों हेतु उतरते हैं, जो उन्हें उनकी आदि वृन्दावन-लीलाओं में देखने हेतु अत्यन्त व्याकुल रहते हैं। अतः कृष्ण अवतार का प्रमुख प्रयोजन अपने अनन्य भक्तों को सन्तुष्ट करना है।
भगवान् कहते हैं कि वे प्रत्येक युग में स्वयं को अवतरित करते हैं। यह इंगित करता है कि वे कलियुग में भी अवतरित होते हैं। जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा गया है, कलियुग का अवतार भगवान् चैतन्य महाप्रभु हैं, जिन्होंने संकीर्तन आन्दोलन (पवित्र नामों के सामूहिक कीर्तन) द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना का प्रसार किया, तथा सम्पूर्ण भारत में कृष्णभावनामृत का प्रसार किया। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि संकीर्तन की यह संस्कृति सम्पूर्ण संसार में, नगर-नगर तथा ग्राम-ग्राम में प्रसारित होगी। भगवान् चैतन्य का, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में, उपनिषद्, महाभारत, भागवत आदि प्रकट शास्त्रों के गोपनीय अंशों में गुप्त रूप से वर्णन किया गया है, किन्तु प्रत्यक्ष रूप से नहीं। भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त भगवान् चैतन्य के संकीर्तन आन्दोलन से अत्यधिक आकृष्ट होते हैं। भगवान् का यह अवतार दुष्टों का वध नहीं करता, अपितु भगवान् की अहैतुकी कृपा से उनका उद्धार करता है।