हि

अध्याय 5 · 24 / 27

5.25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥

लभन्ते—प्राप्त करते हैं; ब्रह्म-निर्वाणम्—परम में मुक्ति; ऋषयः—जो भीतर सक्रिय हैं; क्षीण-कल्मषाः—जो समस्त पापों से रहित हैं; छिन्न—छिन्न; द्वैधाः—द्वैत; यत-आत्मानः—आत्म-साक्षात्कार में संलग्न; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; हिते—कल्याण-कार्य में; रताः—संलग्न।

जो द्वैत और सन्देह से परे है, जिसका मन भीतर संलग्न है, जो समस्त चेतन प्राणियों के कल्याण के लिए सदा कार्यरत है, और जो समस्त पापों से मुक्त है, वह परम में मुक्ति प्राप्त करता है।

केवल वही व्यक्ति, जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित है, समस्त जीवों के कल्याण-कार्य में संलग्न कहा जा सकता है। जब कोई व्यक्ति वस्तुतः इस ज्ञान में स्थित होता है कि श्रीकृष्ण ही सबके उद्गम-स्रोत हैं, तब वह उसी भाव से कार्य करते हुए सबके लिए कार्य करता है। मानवता के कष्ट इसी कारण हैं कि वह श्रीकृष्ण को परम भोक्ता, परम स्वामी तथा परम मित्र के रूप में भूल जाती है। अतः समूचे मानव समाज के भीतर इस चेतना को पुनर्जीवित करने हेतु कार्य करना ही सर्वोच्च कल्याण-कार्य है। परम में मुक्त हुए बिना कोई प्रथम-श्रेणी के कल्याण-कार्य में संलग्न नहीं हो सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को श्रीकृष्ण की सर्वोच्चता में कोई सन्देह नहीं होता। उसे सन्देह नहीं होता, क्योंकि वह समस्त पापों से पूर्णतः मुक्त है। यही दिव्य प्रेम की अवस्था है।

जो व्यक्ति केवल मानव समाज के शारीरिक कल्याण की सेवा में संलग्न है, वह वस्तुतः किसी की सहायता नहीं कर सकता। बाह्य शरीर और मन को क्षणिक राहत देना सन्तोषजनक नहीं है। जीवन के कठोर संघर्ष में मनुष्य की कठिनाइयों का वास्तविक कारण परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति में पाया जा सकता है। जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति पूर्णतः सचेत होता है, तब वह वस्तुतः मुक्त आत्मा है, भले ही वह भौतिक शरीर रूपी आवरण में रहे।