हि

अध्याय 5 · 23 / 27

5.24

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥

यः—जो; अन्तः-सुखः—भीतर से सुखी; अन्तः-आरामः—भीतर सक्रिय; तथा—साथ ही; अन्तः-ज्योतिः—भीतर लक्ष्य रखने वाला; एव—निश्चय ही; यः—जो कोई; सः—वह; योगी—योगी; ब्रह्म-निर्वाणम्—परम में मुक्त; ब्रह्म-भूतः—आत्म-साक्षात्कारी; अधिगच्छति—प्राप्त करता है।

जिसका सुख भीतर है, जो भीतर सक्रिय है, जो भीतर ही आनन्दित होता है और जो भीतर ही प्रकाशित है, वही वस्तुतः पूर्ण योगी है। वह परम में मुक्त है, और अन्ततः वह परम को प्राप्त करता है।

जब तक मनुष्य भीतर से सुख का आस्वादन करने में समर्थ नहीं होता, तब तक वह उन बाह्य कार्यों से कैसे निवृत्त हो सकता है, जो सतही सुख प्राप्त करने हेतु किए जाते हैं? मुक्त व्यक्ति वास्तविक अनुभव से सुख का भोग करता है। अतः वह किसी भी स्थान पर मौन बैठकर भीतर से जीवन के कार्यों का आनन्द ले सकता है। ऐसा मुक्त व्यक्ति अब बाह्य भौतिक सुख की इच्छा नहीं करता। यह अवस्था ब्रह्म-भूत कहलाती है, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य को भगवद्धाम वापस, अपने घर वापस लौटने का आश्वासन मिल जाता है।