हि

अध्याय 5 · 27 / 27

5.29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥

भोक्तारम्—भोक्ता; यज्ञ—यज्ञ; तपसाम्—तप एवं तपस्याओं का; सर्व-लोक—समस्त लोक तथा उनके देवता; महेश्वरम्—परमेश्वर; सुहृदम्—हितकारी; सर्व—समस्त; भूतानाम्—जीवों का; ज्ञात्वा—इस प्रकार जानकर; माम्—मुझे (भगवान् श्रीकृष्ण को); शान्तिम्—भौतिक पीड़ाओं से राहत; ऋच्छति—प्राप्त करता है।

ऋषिगण मुझे समस्त यज्ञों एवं तपस्याओं का परम प्रयोजन, समस्त लोकों एवं देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का हितकारी एवं शुभचिन्तक जानकर भौतिक दुःखों की पीड़ाओं से शान्ति प्राप्त करते हैं।

माया-शक्ति के पंजे में बँधे बद्धजीव सभी भौतिक जगत् में शान्ति प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं। किन्तु वे शान्ति का सूत्र नहीं जानते, जिसे भगवद्गीता के इस अंश में समझाया गया है। शान्ति का सर्वोत्तम सूत्र मात्र यह है—भगवान् श्रीकृष्ण समस्त मानवीय कार्यों के भोक्ता हैं। मनुष्यों को सब कुछ भगवान् की दिव्य सेवा में अर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि वे समस्त लोकों तथा उनमें स्थित देवताओं के स्वामी हैं। उनसे बड़ा कोई नहीं है। वे देवताओं में महानतम भगवान् शिव तथा भगवान् ब्रह्मा से भी महान् हैं। वेदों में परमेश्वर का वर्णन इस प्रकार है—तमीश्वराणां परमं महेश्वरम्। माया के वशीभूत होकर जीव उन सब वस्तुओं के स्वामी बनने का प्रयास कर रहे हैं, जिन्हें वे देखते हैं, किन्तु वस्तुतः वे भगवान् की भौतिक शक्ति के अधीन हैं। भगवान् भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं, और बद्धजीव भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों के अधीन हैं। जब तक मनुष्य इन सीधे-सादे तथ्यों को नहीं समझता, तब तक संसार में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से शान्ति प्राप्त करना सम्भव नहीं है। कृष्णभावनामृत का यही अभिप्राय है—भगवान् श्रीकृष्ण परम अधीश्वर हैं, और महान् देवताओं सहित समस्त जीव उनके अधीनस्थ हैं। मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में ही पूर्ण शान्ति प्राप्त कर सकता है।

यह पाँचवाँ अध्याय कृष्णभावनामृत का, जो सामान्यतः कर्म-योग के नाम से जाना जाता है, एक व्यावहारिक विवेचन है। कर्म-योग किस प्रकार मुक्ति प्रदान कर सकता है, इस विषय में मानसिक कल्पना के प्रश्न का यहाँ उत्तर दिया गया है। कृष्णभावनामृत में कार्य करना भगवान् को अधीश्वर मानने के पूर्ण ज्ञान सहित कार्य करना है। ऐसा कार्य दिव्य ज्ञान से भिन्न नहीं है। प्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत भक्तियोग है, और ज्ञानयोग भक्तियोग की ओर ले जाने वाला मार्ग है। कृष्णभावनामृत का अर्थ है परम परब्रह्म के साथ अपने सम्बन्ध के पूर्ण ज्ञान सहित कार्य करना, और इस चेतना की पूर्णता श्रीकृष्ण अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का पूर्ण ज्ञान है। शुद्ध आत्मा ईश्वर के अंशस्वरूप के रूप में उनकी नित्य सेविका है। वह माया (भ्रम) के संपर्क में माया पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा के कारण आती है, और यही उसके अनेक कष्टों का कारण है। जब तक वह पदार्थ के संपर्क में है, तब तक उसे भौतिक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करना पड़ता है। तथापि कृष्णभावनामृत मनुष्य को पदार्थ के अधिकार-क्षेत्र के भीतर रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन में ले आता है, क्योंकि यह भौतिक जगत् में अभ्यास द्वारा आध्यात्मिक अस्तित्व का जागरण है। मनुष्य जितना अधिक उन्नत होता है, उतना ही अधिक वह पदार्थ के पंजे से मुक्त होता है। भगवान् किसी के प्रति पक्षपाती नहीं हैं। सब कुछ इन्द्रियों को नियन्त्रित करने तथा इच्छा और क्रोध के प्रभाव को जीतने के प्रयास में मनुष्य के कर्तव्यों के व्यावहारिक निष्पादन पर निर्भर करता है। और उपर्युक्त वासनाओं को नियन्त्रित करके कृष्णभावनामृत प्राप्त करते हुए, मनुष्य वस्तुतः दिव्य अवस्था में, अर्थात् ब्रह्म-निर्वाण में स्थित रहता है। कृष्णभावनामृत में अष्टांग-योग का रहस्यवाद स्वतः ही अभ्यस्त हो जाता है, क्योंकि परम प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, प्राणायाम और समाधि के अभ्यास में उन्नति की क्रमिक प्रक्रिया है। किन्तु ये केवल उस पूर्णता की भूमिका मात्र हैं, जो भक्ति द्वारा प्राप्त होती है, और जो अकेले ही मनुष्य को शान्ति प्रदान कर सकती है। यही जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय “कर्म-योग अथवा कृष्णभावनामृत में कर्म” पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।