अध्याय 6 · 1 / 42
6.1
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
श्री भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; अनाश्रितः—आश्रय रहित; कर्म-फलम्—कर्म का फल; कार्यम्—कर्तव्य; कर्म—कर्म; करोति—करता है; यः—जो; सः—वह; सन्न्यासी—संन्यासी; च—भी; योगी—योगी; च—भी; न—नहीं; निर्—रहित; अग्निः—अग्नि; न—न तो; च—भी; अक्रियः—कर्तव्यरहित।
श्रीभगवान् ने कहा : जो कर्म के फलों के प्रति अनासक्त रहकर अपने विहित कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी तथा वही सच्चा योगी है—न कि वह, जो न तो अग्नि प्रज्वलित करता है और न ही कर्म करता है।
इस अध्याय में भगवान् समझाते हैं कि अष्टांगयोग की प्रक्रिया मन तथा इन्द्रियों को वश में करने का एक साधन है। तथापि सामान्य जनों के लिए इसका पालन अत्यन्त कठिन है, विशेषकर कलियुग में। यद्यपि इस अध्याय में अष्टांगयोग की अनुशंसा की गई है, तथापि भगवान् इस बात पर बल देते हैं कि कर्मयोग की प्रक्रिया, अर्थात् कृष्णभावनामृत में कर्म करना, श्रेष्ठतर है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार तथा उसकी सामग्री के पालन हेतु कर्म करता है, किन्तु कोई भी किसी न किसी स्वार्थ अथवा वैयक्तिक तृप्ति के बिना कर्म नहीं करता, चाहे वह संकुचित हो अथवा विस्तृत। पूर्णता की कसौटी यह है कि मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करे, न कि कर्म के फलों के भोग की दृष्टि से। कृष्णभावनामृत में कर्म करना प्रत्येक जीव का कर्तव्य है, क्योंकि स्वरूपतः सभी परम के अंश हैं। शरीर के अंग समूचे शरीर की तृप्ति हेतु कार्य करते हैं। शरीर के अवयव अपनी तृप्ति के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण समष्टि की तृप्ति के लिए कार्य करते हैं। इसी प्रकार जो जीव अपनी वैयक्तिक तृप्ति के लिए नहीं, अपितु परम समष्टि की तृप्ति के लिए कर्म करता है, वही पूर्ण संन्यासी तथा पूर्ण योगी है।
संन्यासी कभी-कभी कृत्रिम रूप से यह मान लेते हैं कि वे समस्त भौतिक कर्तव्यों से मुक्त हो गए हैं, अतः वे अग्निहोत्र यज्ञों (अग्नि-यज्ञों) का सम्पादन बन्द कर देते हैं; किन्तु वास्तव में वे स्वार्थी होते हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य निराकार ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करना है। ऐसी इच्छा किसी भी भौतिक इच्छा से बड़ी है, फिर भी वह स्वार्थ से रहित नहीं है। इसी प्रकार जो योगी अर्धोन्मीलित नेत्रों से योग-पद्धति का अभ्यास करता है और समस्त भौतिक क्रियाओं को त्याग देता है, वह भी अपने वैयक्तिक स्व के लिए किसी न किसी तृप्ति की कामना करता है। परन्तु कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के समष्टि की तृप्ति के लिए कार्य करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को आत्म-तृप्ति की कोई इच्छा नहीं होती। उसकी सफलता की कसौटी श्रीकृष्ण की तृप्ति है, और इस प्रकार वही पूर्ण संन्यासी अथवा पूर्ण योगी है। त्याग के सर्वोच्च पूर्णतम प्रतीक भगवान् श्रीचैतन्य इस प्रकार प्रार्थना करते हैं :
na dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ kavitāṁ vā jagadīśa kāmaye.
mama janmani janmanīśvare bhavatād bhaktir ahaitukī tvayi.
“हे सर्वशक्तिमान् भगवन्! मुझे न धन संचित करने की इच्छा है, न सुन्दरियों का भोग करने की। न मुझे अनुयायियों की कोई संख्या चाहिए। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मेरे जीवन में आपकी भक्ति की अहैतुकी कृपा बनी रहे।”