हि

अध्याय 5 · 4 / 27

5.4

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥

साङ्ख्य—भौतिक जगत् का विश्लेषणात्मक अध्ययन; योगौ—भक्तिमय कर्म; पृथक्—भिन्न; बालाः—अल्पबुद्धि वाले; प्रवदन्ति—कहते हैं; न—कभी नहीं; पण्डिताः—विद्वान्; एकम्—एक में; अपि—यद्यपि; आस्थितः—स्थित होकर; सम्यक्—पूर्ण; उभयोः—दोनों का; विन्दते—भोगता है; फलम्—फल।

केवल अज्ञानी ही कर्मयोग तथा भक्ति को भौतिक जगत् के विश्लेषणात्मक अध्ययन (सांख्य) से भिन्न बताते हैं। जो वास्तव में विद्वान् हैं वे कहते हैं कि जो इन दोनों मार्गों में से किसी एक का भली-भाँति अनुसरण करता है, वह दोनों के फल प्राप्त कर लेता है।

भौतिक जगत् के विश्लेषणात्मक अध्ययन का उद्देश्य अस्तित्व की आत्मा को ढूँढ़ना है। भौतिक जगत् की आत्मा विष्णु अर्थात् परमात्मा हैं। भगवान् की भक्ति में परमात्मा की सेवा निहित है। एक प्रक्रिया वृक्ष की जड़ को ढूँढ़ना है, और तत्पश्चात् उस जड़ को सींचना है। सांख्य-दर्शन का वास्तविक विद्यार्थी भौतिक जगत् की जड़ विष्णु को ढूँढ़ लेता है, और फिर पूर्ण ज्ञान में भगवान् की सेवा में स्वयं को संलग्न कर देता है। अतः तत्त्वतः इन दोनों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों का लक्ष्य विष्णु ही हैं। जो परम लक्ष्य को नहीं जानते वे कहते हैं कि सांख्य तथा कर्मयोग के प्रयोजन एक नहीं हैं, किन्तु जो विद्वान् है वह इन भिन्न प्रक्रियाओं में एकीकृत लक्ष्य को जानता है।