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अध्याय 5 · 3 / 27

5.3

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

ज्ञेयः—जानना चाहिए; सः—वह; नित्य—सदा; सन्न्यासी—त्यागी; यः—जो; न—कभी नहीं; द्वेष्टि—घृणा करता है; न—न ही; काङ्क्षति—इच्छा करता है; निर्द्वन्द्वः—समस्त द्वन्द्वों से मुक्त; हि—निश्चय ही; महा-बाहो—हे महाबाहु; सुखम्—सुखपूर्वक; बन्धात्—बन्धन से; प्रमुच्यते—पूर्णतः मुक्त हो जाता है।

जो न तो अपने कर्मफलों से घृणा करता है और न उनकी इच्छा करता है, वह सदा त्यागी जाना जाता है। ऐसा व्यक्ति समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर भौतिक बन्धन को सरलता से पार कर लेता है और पूर्णतः मुक्त हो जाता है, हे महाबाहु अर्जुन!

जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में है वह सदैव त्यागी है, क्योंकि वह अपने कर्मफलों के प्रति न घृणा अनुभव करता है और न इच्छा। ऐसा त्यागी, जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में समर्पित है, ज्ञान में पूर्णतः योग्य होता है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध में अपनी स्वरूपगत स्थिति को जानता है। वह भली-भाँति जानता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण हैं और वह स्वयं श्रीकृष्ण का अंश है। ऐसा ज्ञान पूर्ण है, क्योंकि वह गुणतः तथा परिमाणतः सही है। श्रीकृष्ण के साथ एकता की धारणा गलत है, क्योंकि अंश पूर्ण के समान नहीं हो सकता। यह ज्ञान कि मनुष्य गुण में एक है किन्तु परिमाण में भिन्न है, सही दिव्य ज्ञान है, जो मनुष्य को आत्मतृप्त बना देता है, जिसके पास न कुछ पाने की आकांक्षा रहती है और न किसी बात का शोक। उसके मन में कोई द्वन्द्व नहीं है, क्योंकि वह जो कुछ भी करता है, श्रीकृष्ण के लिए करता है। इस प्रकार द्वन्द्वों के स्तर से मुक्त होकर वह इस भौतिक जगत् में रहते हुए भी मुक्त है।