हि

अध्याय 5 · 6 / 27

5.6

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥

सन्न्यासः—संन्यास आश्रम; तु—किन्तु; महा-बाहो—हे महाबाहु; दुःखम्—दुःख; आप्तुम्—से पीड़ित होना; अयोगतः—भक्ति के बिना; योग-युक्तः—भक्ति में संलग्न; मुनिः—मननशील व्यक्ति; ब्रह्म—परम; न—बिना; चिरेण—विलम्ब; अधिगच्छति—प्राप्त करता है।

जब तक मनुष्य भगवान् की भक्ति में संलग्न नहीं होता, तब तक केवल कर्मों का त्याग उसे सुखी नहीं बना सकता। भक्तिमय कर्मों से शुद्ध हुए मुनिगण विलम्ब किए बिना परम को प्राप्त कर लेते हैं।

संन्यासी अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। मायावादी संन्यासी सांख्य-दर्शन के अध्ययन में संलग्न रहते हैं, जबकि वैष्णव संन्यासी भागवत-दर्शन के अध्ययन में संलग्न रहते हैं, जो वेदान्त-सूत्रों पर उचित भाष्य प्रस्तुत करता है। मायावादी संन्यासी भी वेदान्त-सूत्रों का अध्ययन करते हैं, किन्तु अपने ही भाष्य का प्रयोग करते हैं, जिसे शारीरक-भाष्य कहते हैं, जिसकी रचना शंकराचार्य ने की थी। भागवत सम्प्रदाय के विद्यार्थी पाञ्चरात्रिकी विधियों के अनुसार भगवान् की भक्ति में संलग्न रहते हैं, और इसलिए वैष्णव संन्यासियों के पास भगवान् की दिव्य सेवा में अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। वैष्णव संन्यासियों का भौतिक कर्मों से कोई सरोकार नहीं होता, फिर भी वे भगवान् की अपनी भक्ति में नाना प्रकार के कार्य सम्पन्न करते हैं। किन्तु सांख्य तथा वेदान्त के अध्ययन एवं कल्पना में लगे मायावादी संन्यासी भगवान् की दिव्य सेवा का आस्वादन नहीं कर सकते। चूँकि उनका अध्ययन अत्यन्त नीरस हो जाता है, अतः वे कभी-कभी ब्रह्म-कल्पना से ऊब जाते हैं, और इस प्रकार उचित समझ के बिना भागवत की शरण लेते हैं। परिणामस्वरूप श्रीमद्भागवत का उनका अध्ययन कष्टप्रद बन जाता है। मायावादी संन्यासियों के लिए शुष्क कल्पनाएँ तथा कृत्रिम साधनों द्वारा की गई निर्विशेष व्याख्याएँ सर्वथा निरर्थक हैं। भक्ति में संलग्न वैष्णव संन्यासी अपने दिव्य कर्तव्यों के निर्वाह में सुखी रहते हैं, और उन्हें भगवद्धाम में अन्ततः प्रवेश की निश्चितता रहती है। मायावादी संन्यासी कभी-कभी आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से पतित हो जाते हैं और पुनः लोक-कल्याणकारी एवं परोपकारी प्रकार के भौतिक कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं, जो भौतिक व्यापार के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। अतएव निष्कर्ष यह है कि जो कृष्णभावनामृत में संलग्न हैं, वे केवल ब्रह्म-कल्पना में लगे संन्यासियों की अपेक्षा अधिक उत्तम स्थिति में हैं, यद्यपि वे भी अनेक जन्मों के पश्चात् कृष्णभावनामृत को प्राप्त होते हैं।