हि

अध्याय 5 · 7 / 27

5.7

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥

योग-युक्तः—भक्ति में संलग्न; विशुद्ध-आत्मा—शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा—आत्म-संयमी; जित-इन्द्रियः—जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है; सर्वभूत-आत्मभूत-आत्मा—समस्त जीवों के प्रति करुणामय; कुर्वन् अपि—यद्यपि कर्म में संलग्न; न—कभी नहीं; लिप्यते—बँधता है।

जो भक्ति में कर्म करता है, जो शुद्ध आत्मा है, और जो अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सबको प्रिय होता है और सब उसे प्रिय होते हैं। सदा कर्म करते हुए भी ऐसा व्यक्ति कभी नहीं बँधता।

जो कृष्णभावनामृत द्वारा मुक्ति के मार्ग पर है, वह प्रत्येक जीव को अत्यन्त प्रिय होता है, और प्रत्येक जीव उसे प्रिय होता है। यह उसके कृष्णभावनामृत के कारण होता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं सोच सकता, जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते तथा शाखाएँ वृक्ष से पृथक् नहीं होतीं। वह भली-भाँति जानता है कि वृक्ष की जड़ पर जल डालने से वह जल समस्त पत्तों तथा शाखाओं तक वितरित हो जाएगा, अथवा पेट को भोजन देने से ऊर्जा स्वतः ही समूचे शरीर में वितरित हो जाती है। चूँकि जो कृष्णभावनामृत में कर्म करता है वह सबका सेवक है, अतः वह सबको अत्यन्त प्रिय होता है। और चूँकि उसके कर्म से सब सन्तुष्ट रहते हैं, अतः वह चेतना में शुद्ध रहता है। चूँकि वह चेतना में शुद्ध है, अतः उसका मन पूर्णतः वश में रहता है। और चूँकि उसका मन वश में है, अतः उसकी इन्द्रियाँ भी वश में रहती हैं। चूँकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण पर स्थिर रहता है, अतः उसके श्रीकृष्ण से विचलित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। न ही इसकी कोई सम्भावना है कि वह अपनी इन्द्रियों को भगवान् की सेवा के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में लगाए। वह श्रीकृष्ण से सम्बन्धित विषयों के अतिरिक्त कुछ भी सुनना पसन्द नहीं करता; वह कोई भी ऐसी वस्तु खाना पसन्द नहीं करता जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हो; और यदि श्रीकृष्ण का सम्बन्ध न हो तो वह कहीं जाना नहीं चाहता। अतः उसकी इन्द्रियाँ वश में रहती हैं। संयमित इन्द्रियों वाला व्यक्ति किसी के प्रति आक्रामक नहीं हो सकता। कोई पूछ सकता है, “तो फिर अर्जुन ने (युद्ध में) दूसरों के प्रति आक्रामकता क्यों दिखाई? क्या वह कृष्णभावनामृत में नहीं था?” अर्जुन केवल ऊपरी तौर पर आक्रामक था, क्योंकि (जैसा कि दूसरे अध्याय में पहले ही समझाया जा चुका है) युद्धभूमि में एकत्र सभी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से जीवित रहते, क्योंकि आत्मा का वध नहीं किया जा सकता। अतः आध्यात्मिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में किसी का वध नहीं हुआ। श्रीकृष्ण के आदेश से, जो स्वयं वहाँ उपस्थित थे, केवल उनके वस्त्र बदले गए। अतएव कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में युद्ध करते समय अर्जुन वास्तव में युद्ध कर ही नहीं रहा था; वह तो पूर्ण कृष्णभावनामृत में केवल श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन कर रहा था। ऐसा व्यक्ति कर्म की प्रतिक्रियाओं में कभी नहीं बँधता।