हि

अध्याय 6 · 23 / 42

6.28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥

युञ्जन्—इस प्रकार योगाभ्यास में संलग्न होकर; एवम्—इस प्रकार; सदा—सदैव; आत्मानम्—आत्मा; योगी—जो परमात्मा के सम्पर्क में है; विगत—मुक्त हो जाता है; कल्मषः—समस्त भौतिक संदूषण से; सुखेन—दिव्य सुख में; ब्रह्म-संस्पर्शम्—परमेश्वर के निरन्तर सम्पर्क में रहते हुए; अत्यन्तम्—सर्वोच्च; सुखम्—सुख; अश्नुते—प्राप्त करता है।

आत्मा में स्थिर रहकर तथा समस्त भौतिक संदूषण से मुक्त होकर योगी परम चेतना के सम्पर्क में सुख की सर्वोच्च पूर्ण अवस्था को प्राप्त करता है।

आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है परमेश्वर के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना। जीवात्मा परमेश्वर का अंश है, और उसकी स्थिति भगवान् को दिव्य सेवा अर्पित करना है। परमेश्वर के साथ इस दिव्य सम्पर्क को ब्रह्म-संस्पर्श कहा जाता है।